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त्रिपुरा-NDDB एमओयू: दूध उत्पादन बढ़ाने और श्वेत क्रांति 2.0 की दिशा में बड़ा कदम

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त्रिपुरा-NDDB एमओयू: दूध उत्पादन बढ़ाने और श्वेत क्रांति 2.0 की दिशा में बड़ा कदम

सारांश

त्रिपुरा सरकार और एनडीडीबी के बीच हुए इस एमओयू से राज्य के डेयरी सेक्टर में नई जान आने की उम्मीद है। प्रतिदिन 7.2 लाख लीटर उत्पादन के बावजूद संगठित प्रोसेसिंग की कमी एक बड़ी चुनौती रही है — यह साझेदारी उसी खाई को पाटने की कोशिश है।

मुख्य बातें

त्रिपुरा सरकार (एआरडीडी) , एनडीडीबी और जीसीएमपीयूएल ने 23 जून 2026 को त्रिपक्षीय एमओयू पर हस्ताक्षर किए।
मुख्यमंत्री माणिक साहा की उपस्थिति में अगरतला में हुए इस समझौते का लक्ष्य दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
राज्य में वर्तमान दूध उत्पादन सालाना 2.63 लाख मीट्रिक टन (प्रतिदिन 7.2 लाख लीटर ); वृद्धि दर 6.5% सालाना ।
प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 173 ग्राम प्रतिदिन — पूर्वोत्तर राज्यों में सर्वाधिक।
राज्य के डेयरी प्लांट की 40,000 लीटर प्रतिदिन प्रोसेसिंग क्षमता अभी पूरी तरह उपयोग में नहीं।
एमओयू श्वेत क्रांति 2.0 और सीसीडीडीपी के राष्ट्रीय विज़न के अनुरूप है।

त्रिपुरा सरकार के पशु संसाधन विकास विभाग (एआरडीडी) और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) ने मंगलवार, 23 जून 2026 को एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य राज्य में दूध उत्पादन बढ़ाना, डेयरी सहकारी ढाँचे को आधुनिक बनाना और किसानों की आय में वृद्धि करना है। यह समझौता अगरतला में मुख्यमंत्री माणिक साहा की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

एमओयू में क्या शामिल है

यह त्रिपक्षीय समझौता राज्य सरकार, एनडीडीबी और गोमती कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड (जीसीएमपीयूएल) के बीच हुआ है। समझौते के तहत राज्य सरकार नीतिगत सहायता प्रदान करेगी, जीसीएमपीयूएल नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगा, और एनडीडीबी तकनीकी विशेषज्ञता, क्षमता निर्माण तथा बाज़ार विकास में सहयोग देगा।

इस एमओयू का मूल लक्ष्य 'व्यापक सहकारी डेयरी विकास योजना' (सीसीडीडीपी) को लागू करना है, जो राष्ट्रीय श्वेत क्रांति 2.0 के विज़न के अनुरूप है। इसके अंतर्गत सहकारी समितियों को सुदृढ़ करना, उत्पादकता में सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण, डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा देना और टिकाऊ आजीविका के अवसर सृजित करना प्रमुख उद्देश्य हैं।

त्रिपुरा की मौजूदा डेयरी स्थिति

मुख्यमंत्री साहा ने बताया कि त्रिपुरा में वर्तमान में सालाना लगभग 2.63 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन होता है, जो प्रतिदिन लगभग 7.2 लाख लीटर के बराबर है। राज्य में दूध उत्पादन सालाना लगभग 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और प्रति व्यक्ति उपलब्धता 173 ग्राम प्रतिदिन तक पहुँच चुकी है — जो पूर्वोत्तर राज्यों में सर्वाधिक है।

हालाँकि, साहा ने स्वीकार किया कि उत्पादित दूध का केवल एक छोटा हिस्सा ही संगठित प्रोसेसिंग नेटवर्क तक पहुँच पाता है। राज्य के डेयरी प्लांट की प्रतिदिन 40,000 लीटर दूध प्रोसेस करने की क्षमता है, लेकिन यह क्षमता अभी पूरी तरह उपयोग में नहीं आ रही।

एनडीडीबी का रोडमैप

एनडीडीबी के चेयरमैन मीनेश शाह ने त्रिपुरा में सहकारी डेयरी विकास के लिए एक विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत किया, जिसमें उत्पादकता वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार और बाज़ार तक पहुँच को प्राथमिकता दी गई है। यह साझेदारी हज़ारों किसानों और ग्रामीण परिवारों को सीधे लाभ पहुँचाने की क्षमता रखती है।

गौरतलब है कि दूध की खरीद बढ़ने से पनीर, दही, घी, लस्सी, आइसक्रीम और मिठाइयों जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों का उत्पादन भी विस्तारित होगा, जिससे किसानों के लिए अतिरिक्त आय के रास्ते खुलेंगे।

सरकार की प्रतिक्रिया और प्रतिबद्धता

मुख्यमंत्री साहा ने इस पहल को 'बदलाव लाने वाला' बताते हुए कहा कि त्रिपुरा को देश की डेयरी-आधारित श्वेत क्रांति में सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। इस कार्यक्रम में पशु संसाधन विकास मंत्री सुधांशु दास, सहकारिता मंत्री शुक्ला चरण नोआतिया, वरिष्ठ अधिकारी और डेयरी क्षेत्र के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

आगे की राह

यह एमओयू त्रिपुरा के डेयरी सेक्टर को संगठित और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर भारत में कृषि-आधारित आजीविका को सुदृढ़ करने पर राष्ट्रीय स्तर पर जोर बढ़ रहा है। सीसीडीडीपी के सफल क्रियान्वयन से त्रिपुरा न केवल दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के लिए एक आदर्श मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 40,000 लीटर की प्रोसेसिंग क्षमता का पूरा उपयोग न होना क्यों जारी है — और क्या यह साझेदारी उस संरचनात्मक खामी को दूर करेगी। पूर्वोत्तर में डेयरी सहकारिताएँ अक्सर कोल्ड-चेन की कमी और बाज़ार तक सीमित पहुँच से जूझती हैं, जिसे केवल एमओयू से नहीं सुलझाया जा सकता। एनडीडीबी की विशेषज्ञता निर्विवाद है — गुजरात और राजस्थान में इसकी सफलता देखी जा चुकी है — लेकिन पूर्वोत्तर की भौगोलिक और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ अलग हैं। क्रियान्वयन की समयसीमा और जवाबदेही तंत्र सार्वजनिक न होने तक यह घोषणा अपनी पूरी क्षमता साबित नहीं कर पाएगी।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिपुरा और एनडीडीबी के बीच हुए एमओयू का मुख्य उद्देश्य क्या है?
यह एमओयू त्रिपुरा में दूध उत्पादन बढ़ाने, डेयरी सहकारी ढाँचे को आधुनिक बनाने और किसानों के लिए बाज़ार के बेहतर अवसर सृजित करने के लिए हुआ है। यह 'व्यापक सहकारी डेयरी विकास योजना (सीसीडीडीपी)' को लागू करने का आधार बनेगा, जो राष्ट्रीय श्वेत क्रांति 2.0 के विज़न से जुड़ी है।
इस एमओयू में कौन-कौन से पक्ष शामिल हैं?
यह एक त्रिपक्षीय समझौता है जिसमें त्रिपुरा सरकार का पशु संसाधन विकास विभाग (एआरडीडी), नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) और गोमती कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड (जीसीएमपीयूएल) शामिल हैं। राज्य सरकार नीतिगत सहायता देगी, जीसीएमपीयूएल नोडल एजेंसी होगी और एनडीडीबी तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा।
त्रिपुरा में अभी कितना दूध उत्पादन होता है?
मुख्यमंत्री माणिक साहा के अनुसार, त्रिपुरा में वर्तमान में सालाना लगभग 2.63 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन होता है, जो प्रतिदिन लगभग 7.2 लाख लीटर के बराबर है। राज्य में दूध उत्पादन सालाना लगभग 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
इस एमओयू से किसानों और ग्रामीण परिवारों को क्या फायदा होगा?
इस साझेदारी से हज़ारों किसानों और ग्रामीण परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है। दूध की खरीद बढ़ने से पनीर, दही, घी, लस्सी, आइसक्रीम और मिठाइयों जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों का विस्तार होगा, जिससे किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा होंगे।
पूर्वोत्तर में दूध उत्पादन के मामले में त्रिपुरा की स्थिति कैसी है?
त्रिपुरा में प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 173 ग्राम प्रतिदिन है, जो पूर्वोत्तर राज्यों में सर्वाधिक है। हालाँकि, राज्य के डेयरी प्लांट की 40,000 लीटर प्रतिदिन प्रोसेसिंग क्षमता अभी पूरी तरह उपयोग में नहीं आ रही, जो इस क्षेत्र की एक प्रमुख चुनौती है।
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