ट्रंप ने माना — पाकिस्तान के 'आग्रह' पर किया ईरान सीजफायर, मध्यस्थता का दावा खोखला
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 मई को एयरफोर्स वन पर पत्रकारों से बातचीत में स्वीकार किया कि उन्होंने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के व्यक्तिगत आग्रह पर ईरान के साथ सीजफायर पर सहमति जताई — और यह एक 'एहसान' था, न कि किसी स्वतंत्र कूटनीतिक प्रक्रिया का नतीजा। इस बयान ने पाकिस्तान के उस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं जिसमें वह खुद को अमेरिका-ईरान वार्ता का निष्पक्ष और प्रभावशाली मध्यस्थ बताता रहा है।
ट्रंप के शब्दों में क्या था
ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, 'मैं किसी पर उपकार करने में विश्वास नहीं करता। मानता हूं कि एहसान के बदले एहसान की ही इच्छा रखते हैं लोग। लेकिन पाकिस्तान की ओर से मुझसे अनुरोध किया गया तो मैंने यह एहसान कर दिया।' उन्होंने स्पष्ट किया कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आग्रह पर ईरान के साथ सीजफायर पर सहमति बनी और फारस की खाड़ी में आगे की बमबारी से इनकार किया गया।
ट्रंप के अनुसार यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक भूमिका को मान्यता मिल सके। यह स्वीकारोक्ति इस्लामाबाद की 'स्वतंत्र मध्यस्थता' की कहानी को सीधे चुनौती देती है।
ईरान पर ट्रंप का कड़ा रुख बरकरार
ट्रंप ने इसी बातचीत में दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की कोई अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा, 'तेहरान को यूरेनियम छोड़ देना चाहिए।' रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप ने ईरान के शांति प्रस्ताव को पहला वाक्य पढ़ते ही खारिज कर दिया क्योंकि तेहरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की पर्याप्त गारंटी नहीं दी थी।
पाकिस्तान की मध्यस्थता के दावों पर उठते सवाल
यह ट्रंप का बयान ऐसे समय में आया है जब लगातार दूसरे हफ्ते पाकिस्तान की मध्यस्थक भूमिका को लेकर संदेह गहराते जा रहे हैं। अमेरिकी मीडिया ने विश्वस्त सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि इस्लामाबाद कथित तौर पर ईरानी सैन्य विमानों को अपने नूर खान एयरबेस पर पनाह दे रहा था — हालांकि पाकिस्तान ने इस दावे का खंडन किया है।
गौरतलब है कि ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी कहा था कि पाकिस्तान में हुई कुछ विदेशी बैठकों का ईरान से कोई संबंध नहीं है। यह बयान पाकिस्तान की उस कूटनीतिक भूमिका पर सवाल उठाता है जिसे वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचारित करता रहा है।
पाकिस्तान की मजबूरी: अर्थव्यवस्था और प्रासंगिकता
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की यह कूटनीतिक सक्रियता उसकी चरमराती अर्थव्यवस्था और घटती अंतरराष्ट्रीय साख से सीधे जुड़ी है। गंभीर आर्थिक संकट और दिवालिएपन के कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए मध्यस्थ की भूमिका खुद को प्रासंगिक बनाए रखने और बाहरी आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने का एक माध्यम बन गई है।
आलोचकों का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को पनाह देने वाले देश की अपनी छवि से बाहर नहीं निकलता, ऐसे कूटनीतिक दिखावे उसकी दीर्घकालिक स्थिति नहीं बदल सकते।
आगे क्या
ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना है। अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता की दिशा और उसमें इस्लामाबाद की वास्तविक भूमिका आने वाले हफ्तों में और स्पष्ट होगी।