4 नवंबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट: दो से अधिक बच्चों पर चुनाव प्रतिबंध अब प्रासंगिक नहीं, प्रजनन दर 1.9 पर आई

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सुप्रीम कोर्ट: दो से अधिक बच्चों पर चुनाव प्रतिबंध अब प्रासंगिक नहीं, प्रजनन दर 1.9 पर आई

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा — जब देश की प्रजनन दर खुद ही 3 से घटकर 1.9 पर आ चुकी हो, तो दो से अधिक बच्चों पर चुनाव प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों का औचित्य नहीं रहा। महाराष्ट्र सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता रद्द करते हुए कोर्ट ने 2003 के जावेद फैसले को बड़ी पीठ के पास भेजा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को कहा कि दो से अधिक बच्चों पर चुनाव प्रतिबंध लगाने वाले कानून अब शायद प्रासंगिक नहीं।
भारत की कुल प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 प्रति महिला पर आ चुकी है।
नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता रद्द की।
2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार फैसले को बड़ी पीठ की समीक्षा के लिए भेजा गया।
उस फैसले में हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के दो-बच्चे प्रावधान को सही माना गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून अब शायद प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, क्योंकि भारत की कुल प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 प्रति महिला पर आ चुकी है। यह टिप्पणी महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को रद्द करते समय की गई।

मामले का पृष्ठभूमि

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने यह मामला मंगला भीमराव की उस अयोग्यता से जुड़ा था, जिन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण पंचायत चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया गया था। पीठ ने महाराष्ट्र के संबंधित कानून के तहत चल रही कार्यवाही पर रोक लगाते हुए यह टिप्पणी की।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा, 'पिछले दो दशकों में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। जनसंख्या विस्फोट का डर अब नहीं रहा। इसका प्रमाण यह है कि प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 पर आ गई है। इसलिए, दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून, मौजूदा हालात में शायद अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।' कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि ऐसे कानूनों की फिर से समीक्षा की जरूरत है।

2003 के जावेद फैसले की समीक्षा का आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले में दिए गए फैसले को आगे की समीक्षा हेतु बड़ी पीठ के पास भेज दिया। उस फैसले में तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकता था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जब वह फैसला आया था, तब देश की कुल प्रजनन दर लगभग तीन थी और जनसंख्या नियंत्रण एक अहम नीतिगत मुद्दा था।

जनसांख्यिकीय बदलाव और कानून की प्रासंगिकता

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे जा चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि दो-बच्चे की शर्त मूलतः उस दौर की सोच पर आधारित थी जब जनसंख्या विस्फोट एक बड़ी चिंता थी। अब जब प्रजनन दर स्वतः ही नीचे आ रही है, तो इस तरह के दंडात्मक प्रावधानों की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आगे क्या होगा

बड़ी पीठ का गठन और जावेद फैसले की पुनर्समीक्षा यह तय करेगी कि ऐसे राज्य कानून संवैधानिक रूप से कायम रह सकते हैं या नहीं। तब तक, मंगला भीमराव के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक बनी रहेगी। यह फैसला देशभर के उन राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है जहाँ दो-बच्चे की शर्त स्थानीय निकाय चुनावों में अब भी लागू है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि ज़मीनी हकीकत बदल चुकी होती है। प्रजनन दर का 1.9 पर आना खुद ही बताता है कि समाज ने बिना किसी दंडात्मक कानून के परिवार नियोजन अपना लिया है। फिर भी यह प्रतिबंध अब भी ग्रामीण महिलाओं — जैसे मंगला भीमराव — की राजनीतिक भागीदारी छीन रहे थे, जो लैंगिक न्याय के नज़रिए से गंभीर सवाल उठाता है। बड़ी पीठ की समीक्षा ज़रूरी है, लेकिन असली ज़रूरत यह है कि संसद और राज्य विधानसभाएँ स्वयं ऐसे कालातीत प्रावधानों को खत्म करें — न कि अदालतों पर यह काम छोड़ा जाए।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों की शर्त पर क्या कहा?
सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून मौजूदा जनसांख्यिकीय स्थिति में शायद अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। कोर्ट ने भारत की प्रजनन दर के 3 से घटकर 1.9 पर आने को इसका प्रमुख आधार बताया।
मंगला भीमराव का मामला क्या था?
महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव को तीसरा बच्चा होने के कारण राज्य के कानून के तहत पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अयोग्यता को रद्द करते हुए उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी।
2003 का जावेद बनाम हरियाणा सरकार फैसला क्या था?
इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकता था। उस समय देश की प्रजनन दर लगभग 3 थी।
जावेद फैसले की अब समीक्षा क्यों हो रही है?
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पिछले दो दशकों में जनसांख्यिकीय संकेतकों में बड़ा बदलाव आया है और प्रजनन दर 1.9 पर आ चुकी है। इस बदली हुई स्थिति को देखते हुए 2003 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए उसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया है।
इस फैसले का किन लोगों पर असर होगा?
यह फैसला देशभर के उन राज्यों के निवासियों को प्रभावित करेगा जहाँ दो-बच्चे की शर्त पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों में अभी भी लागू है। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाएँ, जो इस प्रावधान की वजह से राजनीतिक भागीदारी से वंचित हो जाती थीं, उन्हें इस फैसले से राहत मिल सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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