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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: पुरुषोत्तम मास दशमी पर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से गूंजा उज्जैन

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महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: पुरुषोत्तम मास दशमी पर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से गूंजा उज्जैन

सारांश

पुरुषोत्तम मास की दशमी पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ। सुबह चार बजे कपाट खुलते ही 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से परिसर गूंज उठा। महानिर्वाणी अखाड़े के संतों ने भस्म अर्पित की; देश-विदेश के श्रद्धालु उमड़ पड़े।

मुख्य बातें

10 जून 2026 को पुरुषोत्तम मास की दशमी तिथि पर महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
सुबह चार बजे भगवान वीरभद्र की आज्ञा के बाद ढोल-नगाड़ों संग कपाट खोले गए।
बाबा महाकाल का पंचामृत अभिषेक तथा भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से विशेष शृंगार किया गया।
महानिर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा कपिला गाय के गोबर व औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म अर्पित की गई।
भस्म आरती में भाग लेने हेतु पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

उज्जैन स्थित विश्वप्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 10 जून 2026 को पुरुषोत्तम मास की दशमी तिथि पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई, जिसमें देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह उमड़ पड़ा। पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों, शंखनाद और मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा।

मुख्य घटनाक्रम

परंपरा के अनुसार सुबह चार बजे भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं के कंठ से 'जय श्री महाकाल' के गगनभेदी जयकारे फूट पड़े और मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो उठा।

कपाट खुलने के तुरंत बाद मंत्रोच्चार के बीच पंचामृत अभिषेक संपन्न किया गया, जिसमें दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बाबा महाकाल का दिव्य स्नान कराया गया। इसके उपरांत बाबा का विशेष शृंगार किया गया।

विशेष शृंगार एवं भस्म अर्पण

शृंगार के क्रम में बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड सजाया गया। उन्हें भांग, चंदन, सूखे मेवों और आभूषणों से राजसी रूप में अलंकृत किया गया, जिसे देख भक्त भावविभोर हो उठे। विशेष शृंगार के बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों ने बाबा को भस्म अर्पित की।

मान्यता है कि भस्म आरती के दौरान महाकाल अपने भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं — यही विश्वास लाखों श्रद्धालुओं को वर्षभर यहाँ खींच लाता है। आरती के अंत में बाबा की कपूर आरती संपन्न की गई और उन्हें भोग अर्पित किया गया।

भस्म की परंपरा और नियम

उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में महाकाल को श्मशान की राख अर्पित की जाती थी, परंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों हेतु पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।

आम जनता पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब पुरुषोत्तम मास के चलते देशभर के शिव भक्तों में विशेष धार्मिक उत्साह है। बाबा महाकाल की भस्म आरती की ख्याति इतनी व्यापक है कि इसमें सामान्य श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश की著名 हस्तियाँ भी दर्शन के लिए उज्जैन पहुँचती हैं। पुरुषोत्तम मास में आरती का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है, जिससे मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक रहती है।

क्या होगा आगे

पुरुषोत्तम मास के शेष दिनों में भी महाकालेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजनों और भस्म आरती का क्रम जारी रहेगा। मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की जा रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का केंद्र बन चुकी है — विशेषकर पुरुषोत्तम मास जैसे पवित्र अवसरों पर जब श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन परंपरा में श्मशान भस्म के स्थान पर अब कपिला गाय के गोबर से तैयार भस्म का उपयोग एक सोची-समझी व्यावहारिक पहल है, जो धार्मिक आस्था को स्वच्छता और स्वास्थ्य-सुरक्षा से जोड़ती है। मंदिर प्रशासन के लिए असली चुनौती यह है कि बढ़ती भीड़ के बावजूद दर्शन की गुणवत्ता और अनुशासन बनाए रखा जाए, जो पिछले कुंभ और महाशिवरात्रि आयोजनों में कभी-कभी दबाव में आई है।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है और यह क्यों प्रसिद्ध है?
भस्म आरती महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन का सबसे पवित्र और प्राचीन दैनिक अनुष्ठान है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि इस आरती के दौरान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जो इसे देश की सर्वाधिक विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में से एक बनाता है।
भस्म आरती में किस प्रकार की भस्म का उपयोग किया जाता है?
वर्तमान में भस्म आरती में विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। प्राचीन परंपरा में श्मशान की राख अर्पित की जाती थी, परंतु समय के साथ यह बदलाव किया गया।
भस्म आरती में शामिल होने के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है। आरती प्रतिदिन सुबह चार बजे प्रारंभ होती है और इसके लिए पूर्व पंजीकरण आवश्यक होता है।
पुरुषोत्तम मास में महाकाल दर्शन का क्या महत्व है?
पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और इस दौरान शिव मंदिरों में दर्शन-पूजन का विशेष फल बताया गया है। इस मास में महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक रहती है।
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती कितने बजे होती है?
भस्म आरती प्रतिदिन सुबह चार बजे होती है। इससे पहले भगवान वीरभद्र की आज्ञा ली जाती है और ढोल-नगाड़ों के साथ कपाट खोले जाते हैं, जिसके बाद पंचामृत अभिषेक, विशेष शृंगार और भस्म अर्पण का क्रम संपन्न होता है।
राष्ट्र प्रेस
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