यूपी के 16 जिलों में 100% संस्थागत प्रसव, अप्रैल–जून 2025 में एक भी घरेलू प्रसव नहीं
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश सरकार ने सुरक्षित मातृत्व के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया है — प्रदेश के 16 जिलों में अप्रैल से जून 2025 के बीच शत-प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में संपन्न हुए, और इस पूरी अवधि में एक भी गैर-संस्थागत प्रसव दर्ज नहीं किया गया। स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) के आँकड़ों पर आधारित यह उपलब्धि राज्य की मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में आए व्यापक सुधार को रेखांकित करती है।
किन जिलों में मिली यह सफलता
HMIS आँकड़ों के अनुसार, गोरखपुर, देवरिया, आज़मगढ़, वाराणसी, अमेठी, अयोध्या, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, गाज़ीपुर, शामली, गाज़ियाबाद, हाथरस, इटावा, महोबा और कौशांबी — इन 16 जिलों में तीन महीने के दौरान सभी प्रसव अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हुए। यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत प्रसव दर को और बेहतर बनाने की कोशिशें जारी हैं।
सरकार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लक्ष्य प्रत्येक गर्भवती महिला को गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि जिला महिला अस्पतालों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक प्रसूति सेवाओं को सुदृढ़ किया गया है, आवश्यक उपकरण और प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता बढ़ाई गई है, और रेफरल व्यवस्था को भी मज़बूत किया गया है।
संयुक्त निदेशक डॉ. शालू गुप्ता ने बताया कि गर्भवती महिलाओं का समय पर पंजीकरण, नियमित प्रसव-पूर्व जाँच, उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, और एम्बुलेंस सेवाओं की सुलभता ने इस बदलाव में निर्णायक भूमिका निभाई है। जननी सुरक्षा योजना और मातृत्व लाभ से जुड़े प्रोत्साहनों ने भी महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित किया।
वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. चंद्रावती के अनुसार, संस्थागत प्रसव मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है। उन्होंने कहा कि अस्पतालों में प्रशिक्षित डॉक्टरों, आपातकालीन प्रसूति सेवाओं, रक्त की उपलब्धता और रेफरल व्यवस्था के चलते जटिल परिस्थितियों में भी माँ और शिशु की जान बचाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की भूमिका
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह सफलता केवल अस्पतालों की क्षमता का नतीजा नहीं है — आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने गर्भवती महिलाओं से नियमित संपर्क बनाए रखा, परिवारों को प्रसव की संभावित तिथि से पहले तैयार किया और समय पर अस्पताल तक पहुँच सुनिश्चित की। गौरतलब है कि घर-घर संपर्क और सामुदायिक जागरूकता अभियानों ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में विशेष प्रभाव डाला है।
आगे क्या होगा
डॉ. जोवेल ने उम्मीद जताई कि यदि संस्थागत प्रसव की यह दर बनी रहती है, तो मातृ मृत्यु दर (MMR) और नवजात मृत्यु दर (NMR) में और अधिक कमी लाई जा सकेगी। उत्तर प्रदेश, जो कि ऐतिहासिक रूप से इन संकेतकों में राष्ट्रीय औसत से पिछड़ा रहा है, अब सुरक्षित मातृत्व के मॉडल राज्य के रूप में एक नई मिसाल कायम करने की दिशा में अग्रसर है।