जननी सुरक्षा योजना से यूपी में 7.17 लाख संस्थागत प्रसव, मातृ मृत्युदर में उल्लेखनीय गिरावट
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश में जननी सुरक्षा योजना (JSY) के प्रभावी क्रियान्वयन से संस्थागत प्रसव की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसका सीधा असर मातृ मृत्यु दर (MMR) में गिरावट के रूप में सामने आ रहा है। चालू वित्त वर्ष में 1 अप्रैल से 9 अगस्त 2026 के बीच प्रदेश में 7,17,736 संस्थागत प्रसव दर्ज किए गए हैं, जो योगी सरकार की स्वास्थ्य नीतियों की सफलता को रेखांकित करते हैं।
जननी सुरक्षा योजना की कार्यप्रणाली
स्वास्थ्य सचिव एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवल के अनुसार, इस योजना के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने वाली गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह राशि ₹1,400 और शहरी क्षेत्रों में ₹1,000 निर्धारित है। इस प्रोत्साहन राशि का उद्देश्य महिलाओं को घर पर प्रसव के जोखिम से बचाकर अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में सुरक्षित प्रसव के लिए प्रेरित करना है।
योजना के अंतर्गत 1 अप्रैल से 9 अगस्त के बीच कुल 7,17,736 संस्थागत प्रसवों में से 5,43,661 लाभार्थियों को भुगतान पूर्ण किया जा चुका है। यह ऐसे समय में आया है जब प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम छोर तक पहुँचाने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही है।
उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले जिले
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हाथरस, मैनपुरी, फिरोजाबाद, हरदोई, कानपुर देहात, मुजफ्फरनगर और बागपत, तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से जौनपुर, अम्बेडकरनगर और सोनभद्र ने योजना के क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक भुगतान पहुँचाने में श्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। इन सभी जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक लाभार्थियों को भुगतान हो चुका है।
गौरतलब है कि सोनभद्र जैसे आदिवासी बहुल और दूरदराज के जिले से लेकर पश्चिमी सीमावर्ती जिले मुजफ्फरनगर तक का एकसमान बेहतर प्रदर्शन यह दर्शाता है कि योजना की पहुँच भौगोलिक बाधाओं को पार कर रही है।
पिछड़े जिलों पर विशेष ध्यान
हालाँकि, सिद्धार्थनगर, बहराइच और अलीगढ़ में भुगतान की दर अभी भी 50 प्रतिशत या उससे कम बनी हुई है। डॉ. पिंकी जोवल ने बताया कि इन जिलों के स्थानीय अधिकारियों को सभी अवरोध दूर कर शत-प्रतिशत लाभार्थियों तक भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU), लखनऊ की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल के अनुसार, संस्थागत प्रसव केवल प्रसव की जगह बदलने तक सीमित नहीं है — यह माँ और नवजात दोनों की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में प्रसव के दौरान जटिलताओं की समय रहते पहचान और उपचार संभव होता है, और जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित चिकित्सक, स्टाफ नर्स, दवाएँ, रक्त की उपलब्धता तथा आपातकालीन सेवाएँ भी सुनिश्चित की जाती हैं।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका
योजना की सफलता में आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य विभाग के फील्ड कर्मचारियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। ये कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व जाँच, संस्थागत प्रसव के लाभ और सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें समय पर स्वास्थ्य संस्थान तक पहुँचाने का काम करती हैं। आने वाले महीनों में सरकार का लक्ष्य शेष पिछड़े जिलों में भी भुगतान और पंजीकरण की दर को शत-प्रतिशत करना है।