उत्तर प्रदेश: 7वीं कक्षा की परीक्षा में 'पंडित' पर विवाद, अखिलेश यादव ने बताया अपमानजनक
सारांश
Key Takeaways
- पंडित से जुड़ा सवाल विवाद का कारण बना।
- अखिलेश यादव ने इसे समाज विशेष का अपमान बताया।
- प्रश्न पत्र बनाने में सत्ता का हस्तक्षेप होने का आरोप।
लखनऊ, १८ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश में 'पंडित' से संबंधित प्रश्न ने सातवीं कक्षा की परीक्षा में एक नई बहस छेड़ दी है। पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे 'समाज विशेष' का अपमान करार दिया है।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में इस प्रश्न पर अपनी चिंता व्यक्त की, जिसमें उन्होंने कहा कि यह एक बार फिर से 'समाज विशेष' का अपमान है। उनका कहना है कि यह सब जानबूझकर सत्ता के इशारों पर हो रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि यह सवाल केवल प्रश्न पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी उठना चाहिए कि क्या प्रश्न पत्र तैयार करने वाली समिति में सत्ता के लोग शामिल हैं। यदि इस 'पीड़ित' समाज का कोई सदस्य उस समिति में होता, तो क्या ऐसा प्रश्न बनाया जाता?
अखिलेश यादव ने उदाहरण देते हुए कहा कि भविष्य में ऐसे प्रश्नपत्र बन सकते हैं जैसे- 'हाता नहीं भाता' कहावत का अर्थ बताइए, एक समाज विशेष की बैठकों पर नोटिस किसने दिया था? कुंभ मेले में शंकराचार्य के स्नान की परंपरा किसने तोड़ी? एक नवविवाहित को बिना कारण जेल में रखने की घटना किसके शासन काल में हुई? क्या यह उचित है कि एक समाज विशेष के सम्मानित व्यक्तियों की मूरत नहीं लगने देने के लिए चबूतरा तोड़ने का कार्य किसके आदेश पर किया गया?
अखिलेश ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में कौन लोग देशद्रोही थे? 'वनस्पतिवादी' किसे कहा जाता है? 'मुकदमा वापसी' को उदाहरण सहित समझाइए।
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि हाल में सातवीं कक्षा की संस्कृत परीक्षा में एक पहेली पूछी गई थी, जिसमें कहा गया था, 'बिना पैर के दूर तक जाता है और साक्षर है परंतु पंडित नहीं है।' इसे जातिसूचक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।