वडोदरा बीएपीएस मंदिर में 1,200 व्यंजनों का भव्य अन्नकूट, 300 महिला भक्त 10 नवंबर की तैयारी में जुटीं
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के वडोदरा के अटलादरा स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में नूतन वर्ष के उपलक्ष्य में एक भव्य अन्नकूट महोत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं, जिसमें 1,200 से अधिक व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाएंगे। 300 से अधिक महिला भक्त, बच्चे और वरिष्ठ सदस्य पिछले एक सप्ताह से इस धार्मिक आयोजन की सेवा में समर्पित भाव से लगे हैं। मुख्य महाभोग 10 नवंबर 2026 को प्रातःकाल से भगवान को चढ़ाया जाएगा।
तैयारियों का विस्तार
मंदिर प्रांगण में एक सप्ताह से सेवा-कार्य चल रहा है, जिसमें 15 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की महिलाएँ स्वयंसेवी भाव से भाग ले रही हैं। बीएपीएस भक्त मेघा शेखावत ने बताया कि 28 अक्टूबर से 10 नवंबर तक यह सेवा अनवरत जारी रहेगी। उन्होंने कहा, 'जिस तरह हिंदू संस्कृति में गोवर्धन पूजा का महत्व है और भगवान को भोग लगाया जाता है, उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए हम अपने भगवान को भोग अर्पित करते हैं।'
अन्नकूट की धार्मिक परंपरा
बीएपीएस संत स्वामी ज्ञानवत्सल ने अन्नकूट की पौराणिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्षा ऋतु के बाद जब प्रथम फसल आती है और गोकुलवासी नई फसल लेकर घर लौटे, तब सर्वप्रथम भोग भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया गया। उन्होंने कहा, 'अन्नकूट अर्थात अन्न के पूरे पहाड़ का प्रथम भोग भगवान को अर्पित करने की यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के समय से चली आ रही है और आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।'
प्रसाद वितरण और अन्न-सम्मान
स्वामी ज्ञानवत्सल ने यह भी स्पष्ट किया कि अन्नकूट में चढ़ाए गए 1,200 थालों का महाभोग सांयकाल तक मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। उन्होंने विशेष रूप से कहा, 'हम अन्न का एक भी कण नष्ट नहीं होने देते।' भगवान के सम्मुख भक्तिभाव और प्रेम से प्रत्येक थाल तैयार किया जाता है।
दीपावली और नूतन वर्ष का उत्सवी माहौल
स्वामी ज्ञानवत्सल के अनुसार दीपावली पर्व की निकटता को देखते हुए मंदिर परिसर में साफ-सफाई और सजावट का कार्य भी साथ-साथ चल रहा है। उन्होंने कहा कि सनातन हिंदू धर्म में दीपावली का पर्व अत्यंत भव्यता के साथ मनाया जाता है और इस वर्ष का अन्नकूट महोत्सव इस उत्सव को और अधिक विशेष बनाएगा। यह आयोजन श्रद्धालुओं की आस्था, सामुदायिक सेवा और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।