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वंदे मातरम विवाद: मौलाना साजिद रशीदी बोले — राष्ट्रपति कहें तो भी नहीं गाएंगे, संविधान देता है अधिकार

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वंदे मातरम विवाद: मौलाना साजिद रशीदी बोले — राष्ट्रपति कहें तो भी नहीं गाएंगे, संविधान देता है अधिकार

सारांश

वंदे मातरम विवाद में मौलाना साजिद रशीदी का बेबाक बयान — 'राष्ट्रपति भी कहें तो नहीं गाएंगे।' गीतांजलि अंगमो के सवाल से शुरू हुई यह बहस अब संविधान, धर्म और राष्ट्रीय प्रतीकों की सीमाओं को केंद्र में ले आई है।

मुख्य बातें

मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि मुसलमान वंदे मातरम नहीं गाएंगे — चाहे राष्ट्रपति भी कहें, क्योंकि यह उनके धर्म के विरुद्ध है।
गीतांजलि अंगमो (सोनम वांगचुक की पत्नी) ने सवाल उठाया था कि वंदे मातरम के छंदों में हिंदू देवताओं का उल्लेख होने पर अन्य धर्मों के लोग इसे कैसे गाएं।
मौलाना रशीदी ने गजल-वंदे मातरम तुलना को 'गलत जानकारी पर आधारित और आपत्तिजनक' बताया।
AAP नेता प्रियंका कक्कड़ ने कहा — भारतीय नागरिक होने के नाते कानूनों का सम्मान करना सभी का कर्तव्य है।
BJP प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि वंदे मातरम में मां दुर्गा का उल्लेख साहस के प्रतीक के रूप में है, पूजा के रूप में नहीं।

ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने 3 सितंबर को स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुसलमान 'वंदे मातरम' नहीं गाएंगे — चाहे यह कहने वाले एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी हों या देश के राष्ट्रपति। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपने धर्म के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए बाध्य नहीं है। यह बयान गीतांजलि अंगमो — सोनम वांगचुक की पत्नी — के उस वक्तव्य के बाद आया जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि वंदे मातरम के बाद के छंदों में हिंदू देवताओं का उल्लेख होने पर दूसरे धर्मों के लोग इसे कैसे गा सकते हैं।

विवाद की जड़: गीतांजलि अंगमो का सवाल

गीतांजलि अंगमो ने अपने बयान में पूछा था कि यदि वंदे मातरम के परवर्ती छंदों में हिंदू देवताओं का संदर्भ है, तो अन्य धर्मों के अनुयायी इसे किस भाव से गाएं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई हिंदू सूफी कविता गाए तो क्या उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा? इस तुलना ने राजनीतिक और धार्मिक दोनों दायरों में तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर दीं।

मौलाना रशीदी की कड़ी आपत्ति

मौलाना रशीदी ने गीतांजलि अंगमो की गजल-वंदे मातरम तुलना को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा, 'गजलों में रोमांटिक शेर होते हैं, उनमें किसी की पूजा या वंदना नहीं होती। इसलिए उसकी तुलना वंदे मातरम से करना गलत जानकारी पर आधारित है और यह दुर्भाग्यपूर्ण, खेदजनक और आपत्तिजनक है। आप रोमांटिक शेरों की तुलना देवी-देवताओं की पूजा से कर रहे हैं।' उन्होंने आगे कहा, 'अगर सोनम वांगचुक की पत्नी ही नहीं बल्कि देश के राष्ट्रपति भी कहें कि मुसलमानों को इसे गाना चाहिए, तो भी हम इसे नहीं गाएंगे क्योंकि यह हमारे धर्म के खिलाफ है। देश का संविधान हमें यह इजाजत देता है।'

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

आम आदमी पार्टी (AAP) की नेता प्रियंका कक्कड़ ने संयमित रुख अपनाते हुए कहा कि यह विषय अब कानून का हिस्सा बन चुका है और सभी नागरिकों का कर्तव्य है कि वे भारत के कानूनों का पालन करें। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि विवाद यहीं खत्म होना चाहिए और सभी भारतीयों में राष्ट्रगान और अपने राष्ट्रगीत के लिए सम्मान होना चाहिए।'

वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ता आरपी सिंह ने गीतांजलि अंगमो के मूल तर्क को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि वंदे मातरम में मां दुर्गा का उल्लेख साहस और शत्रुओं के संहार के प्रतीक के रूप में है, न कि उपासना के रूप में। उन्होंने कहा, 'यह देखने के बजाय कि हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है, यह देखना चाहिए उसके पीछे का प्रयोजन क्या है। वंदे मातरम गाने में क्या दिक्कत है? इस गाने ने देश को आजादी दिलाई।' उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग पर निशाना साधते हुए कहा कि वे उसी गाने से 'भाग रहे हैं।'

संवैधानिक और ऐतिहासिक संदर्भ

गौरतलब है कि 'वंदे मातरम' को लेकर यह विवाद नया नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही इसके धार्मिक संदर्भों को लेकर बहस होती रही है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह तय किया था कि केवल गीत के पहले दो छंद ही राष्ट्रगीत के रूप में गाए जाएंगे। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न अवसरों पर स्पष्ट किया है कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है।

आगे क्या

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब धार्मिक पहचान और राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सार्वजनिक विमर्श पहले से तीखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बहस का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और आपसी संवाद से निकलेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह यह है कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यही समझौता किया था — केवल पहले दो छंद — और वह राजनीतिक सहमति आज भी कानूनी रूप से वैध है। असली सवाल यह नहीं है कि कौन गाएगा या नहीं — असली सवाल यह है कि क्या यह बहस राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती है या केवल चुनावी ध्रुवीकरण का औजार बनती है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना साजिद रशीदी ने वंदे मातरम पर क्या कहा?
मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि मुसलमान वंदे मातरम नहीं गाएंगे, चाहे राष्ट्रपति भी यह कहें, क्योंकि यह उनके धर्म के विरुद्ध है। उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के खिलाफ काम न करने का अधिकार देता है।
गीतांजलि अंगमो ने वंदे मातरम पर क्या सवाल उठाया था?
गीतांजलि अंगमो ने सवाल उठाया कि वंदे मातरम के परवर्ती छंदों में हिंदू देवताओं का उल्लेख होने पर दूसरे धर्मों के लोग इसे किस भाव से गाएं। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि कोई हिंदू सूफी कविता गाए तो क्या उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
क्या भारत में वंदे मातरम गाना अनिवार्य है?
नहीं, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने तय किया था कि केवल पहले दो छंद ही राष्ट्रगीत के रूप में गाए जाएंगे।
BJP और AAP ने इस विवाद पर क्या रुख अपनाया?
BJP प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि वंदे मातरम में मां दुर्गा का उल्लेख साहस के प्रतीक के रूप में है और गाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। AAP नेता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि सभी नागरिकों को राष्ट्रगीत का सम्मान करना चाहिए और विवाद यहीं खत्म होना चाहिए।
वंदे मातरम विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
वंदे मातरम को लेकर बहस स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से चली आ रही है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह तय किया था कि केवल पहले दो छंद राष्ट्रगीत के रूप में मान्य होंगे, क्योंकि बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ हैं।
राष्ट्र प्रेस
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