पश्चिम बंगाल की नई औद्योगिक नीति: जमीन मालिकों को मिलेगी इकाइयों में हिस्सेदारी, सितंबर तक ऐलान संभव
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल सरकार सितंबर 2026 के मध्य तक अपनी नई औद्योगिक नीति की घोषणा करने की तैयारी में है, जिसमें एक अहम प्रावधान के तहत जमीन मालिकों को संबंधित औद्योगिक इकाइयों में हिस्सेदार बनाए जाने का विकल्प शामिल किया जा सकता है। यह कदम राज्य में जमीन अधिग्रहण से जुड़ी पुरानी और जटिल समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में उठाया जा रहा है।
नीति में क्या है खास प्रावधान
नई औद्योगिक नीति तैयार करने में शामिल राज्य सरकार के एक अधिकारी के अनुसार, जमीन मालिकों को हिस्सेदार बनाने के लिए दो विकल्पों पर विचार हो रहा है। अधिकारी ने कहा, 'पहला विकल्प प्रस्तावित औद्योगिक इकाई में जमीन-मालिक परिवार के एक सदस्य को रोजगार देना है। दूसरा विकल्प जमीन-मालिकों को मुख्य औद्योगिक इकाई की जरूरतों को पूरा करने वाले 'अप्रत्यक्ष सहयोग' वाले उद्यम शुरू करने में सक्षम बनाना है।'
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि बड़ी औद्योगिक इकाइयों में सहायक उद्योगों की पर्याप्त गुंजाइश होती है — चाहे वे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हों या सर्विस सेक्टर की। इनमें 'प्रत्यक्ष' और 'अप्रत्यक्ष' दोनों तरह के उद्यम शामिल हो सकते हैं।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग का अंतर
अधिकारी के अनुसार, 'प्रत्यक्ष सहयोग' वाले उद्यमी वे होते हैं जो मुख्य उद्योग के लिए तकनीकी रूप से विशेष उपकरण सप्लाई करते हैं — इस क्षेत्र में जमीन-मालिकों की भागीदारी संभव नहीं होगी। हालांकि, 'अप्रत्यक्ष सहयोग' वाले उद्यमों में जमीन-मालिकों को शामिल करने की पर्याप्त संभावना है।
इसके व्यावहारिक उदाहरण देते हुए अधिकारी ने बताया कि जमीन-मालिकों द्वारा सहकारी आधार पर संचालित स्थानीय सिलाई इकाई — जो फैक्टरी कर्मचारियों को यूनिफॉर्म सप्लाई करे — या सहकारी कैंटीन — जो कर्मचारियों के लिए लंच-बॉक्स उपलब्ध कराए — ऐसे 'अप्रत्यक्ष सहयोग' के सामान्य उदाहरण हैं।
सिंगुर-नंदीग्राम की पृष्ठभूमि
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में जमीन अधिग्रहण का मुद्दा दशकों से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल में हुगली जिले के सिंगुर में छोटी कार परियोजना और पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में केमिकल हब परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर राज्य में बड़े आंदोलन हुए थे। इन्हीं आंदोलनों ने वाम मोर्चे की सत्ता को कमजोर करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
गौरतलब है कि वर्तमान सरकार उसी राजनीतिक इतिहास से सबक लेते हुए जमीन अधिग्रहण को विवादमुक्त बनाने की कोशिश कर रही है।
प्राथमिकता वाले क्षेत्र और उत्तर बंगाल की 'ट्रिपल-टी' नीति
राज्य के वाणिज्य और उद्योग मंत्री तापस रॉय ने इस महीने की शुरुआत में बताया था कि नई औद्योगिक नीति उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देगी जहाँ सहायक उद्योगों (एंसिलरी इंडस्ट्रीज) की मजबूत माँग है। इनमें टेक्सटाइल और गारमेंट्स, लोहा और स्टील, भारी बिजली के उपकरण, ऑटोमोटिव उद्योग, और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) व इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं।
उत्तर बंगाल के लिए प्रस्तावित नीति का केंद्र 'ट्रिपल-टी' फॉर्मूला होगा — यानी चाय, लकड़ी और पर्यटन। यह क्षेत्रीय विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया दृष्टिकोण है।
आगे क्या होगा
राज्य सरकार सितंबर 2026 के मध्य तक नई औद्योगिक नीति की औपचारिक घोषणा करने की दिशा में काम कर रही है। जमीन-मालिकों की हिस्सेदारी का यह मॉडल, यदि लागू होता है, तो यह न केवल निवेश आकर्षण को बढ़ा सकता है, बल्कि स्थानीय समुदायों की औद्योगीकरण में भागीदारी सुनिश्चित करने का एक नया उदाहरण भी बन सकता है।