कन्याकुमारी: जंगली धान खरपतवार से 150 एकड़ फसल खतरे में, किसान संघ ने सरकार से तत्काल मदद माँगी
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के थोवलाय तालुक में किसान 'जंगली धान' नामक खरपतवार के तेज़ी से फैलाव से गंभीर संकट में हैं। चेन्बागारमनपुथूर क्षेत्र में धान के कुल 500 एकड़ खेतों में से करीब 150 एकड़ इस खरपतवार की चपेट में आ चुके हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है और फसल उत्पादकता पर सीधा असर पड़ रहा है। चेन्बागारमनपुथूर किसान संघ ने राज्य सरकार और कृषि विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है।
मुख्य घटनाक्रम
स्थानीय किसानों के अनुसार, जंगली धान को पहली बार करीब चार साल पहले इस क्षेत्र में देखा गया था, लेकिन हालिया सीजन में इसका फैलाव चिंताजनक गति से बढ़ा है। इस सीजन में किसानों ने अंबई-16, टीपीएस-5 और अंबई-21 जैसी धान की किस्में उगाई हैं, जो विशेष रूप से रोपाई वाले खेतों में इस खरपतवार के प्रकोप से प्रभावित हो रही हैं।
जंगली धान क्यों है इतना खतरनाक
आम खरपतवारों के मुकाबले जंगली धान की पहचान करना कहीं अधिक कठिन है — विकास के शुरुआती चरणों में यह असली धान की पत्तियों जैसा ही दिखता है। यह खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्व, पानी और ज़मीन की जगह साझा करता है, जिससे उत्पादकता में उल्लेखनीय गिरावट आती है। किसानों को इसे हाथ से पहचान कर निकालने के लिए अतिरिक्त मज़दूर लगाने पड़ते हैं, जिससे प्रति एकड़ खेती की लागत में वृद्धि हो रही है।
आम जनता और किसानों पर असर
खेतों में छूट गए जंगली धान के बीज अगले सीजन में फिर से अंकुरित होते हैं, जिससे यह समस्या एक दुष्चक्र बन जाती है। किसानों को आशंका है कि यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले सीजन में यह खरपतवार और बड़े इलाके में फैल सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु के कृषि क्षेत्र पर पहले से ही मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती इनपुट लागत का दबाव है।
सरकार से माँग
चेन्बागारमनपुथूर किसान संघ ने तमिलनाडु राज्य सरकार और कृषि विभाग से अपील की है कि वे इस खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए तुरंत कदम उठाएँ। किसानों की माँग है कि अभी तक अप्रभावित खेतों में इसके फैलाव को रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए और किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाए।
क्या होगा आगे
यदि कृषि विभाग समय पर हस्तक्षेप करता है, तो बीज-प्रबंधन और रोकथाम के उपायों से अगले सीजन में नुकसान को सीमित किया जा सकता है। गौरतलब है कि जंगली धान की समस्या केवल कन्याकुमारी तक सीमित नहीं है — यह देश के कई धान उत्पादक क्षेत्रों में एक उभरती चुनौती बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए एकीकृत खरपतवार प्रबंधन और प्रमाणित बीज के उपयोग पर ज़ोर देना ज़रूरी है।