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नवगीत के भागीरथ उमाकांत मालवीय: जन्मदिन पर याद, जिन्होंने गीत-विधा को दी नई ऊँचाई

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नवगीत के भागीरथ उमाकांत मालवीय: जन्मदिन पर याद, जिन्होंने गीत-विधा को दी नई ऊँचाई

सारांश

उमाकांत मालवीय ने वह काम किया जो उस दौर में लगभग असंभव माना जाता था — जब 'नई कविता' का वर्चस्व था, तब उन्होंने नवगीत को उसके समकक्ष खड़ा किया। 'नवगीत का भागीरथ' कहलाने वाले इस कवि की पंक्तियाँ आज भी हिंदी साहित्य की आत्मा में धड़कती हैं।

मुख्य बातें

उमाकांत मालवीय का जन्म 2 अगस्त 1931 को मुंबई में हुआ; बाद में परिवार प्रयागराज आ गया।
प्रयाग विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा के बाद महालेखाकार कार्यालय में सेवाएँ दीं।
साठ के दशक में 'परिमल' संस्था से जुड़कर नवगीत को नई कविता के समकक्ष प्रतिष्ठित किया।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.
शंभुनाथ सिंह ने उन्हें 'नवगीत का भागीरथ' की उपाधि दी।
11 नवंबर 1982 को निधन; साहित्यिक विरासत को यश मालवीय और अंशु मालवीय आगे बढ़ा रहे हैं।

उमाकांत मालवीय — हिंदी साहित्य में नवगीत को नई पहचान दिलाने वाले उस कवि का नाम, जिनकी कालजयी पंक्ति 'एक चाय की चुस्की, एक कहकहा, अपना तो इतना सामान ही रहा' आज भी पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है। 2 अगस्त 1931 को मुंबई में जन्मे मालवीय का जीवन संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम था।

संघर्षपूर्ण बचपन और शिक्षा

बचपन में ही पिता का निधन हो जाने के कारण उमाकांत मालवीय को जीवन की कठोर वास्तविकताओं से बहुत जल्दी परिचित होना पड़ा। पिता के जाने के बाद उनका परिवार इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) आ गया। यहीं उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की और बाद में महालेखाकार कार्यालय में सेवाएँ देनी शुरू कीं। ट्रेड यूनियन की गतिविधियों से जुड़ाव ने उन्हें आजीवन एक जुझारू इनसान बनाए रखा।

नवगीत को मिली नई पहचान

साठ के दशक में जब 'नई कविता' का बोलबाला था और साहित्य जगत में यह धारणा बलवती हो रही थी कि पारंपरिक गीत-विधा आधुनिक युग की जटिलताओं को व्यक्त करने में असमर्थ है, तब मालवीय ने एक शांत किंतु दूरगामी रचनात्मक क्रांति की नींव रखी। नई कविता और नवलेखन की प्रतिष्ठित संस्था 'परिमल' से जुड़कर उन्होंने अपनी वैचारिक और रचनात्मक क्षमता को निरंतर परिष्कृत किया।

गौरतलब है कि जहाँ नई कविता के पैरोकार गीत-विधा को प्रायः हेय दृष्टि से देखते थे, वहीं मालवीय ने सुदामा पांडेय 'धूमिल' जैसे प्रखर कवियों से बनारस में खुलकर बौद्धिक बहसें कीं। उन्होंने कविता के वाचिक पक्ष को केंद्र में रखकर नवगीत को नई कविता के समकक्ष प्रतिष्ठित किया।

रचनाओं में जीवन और समाज का यथार्थ

उमाकांत मालवीय के गीत केवल भावुकता से भरे नहीं थे — उनमें जीवन, राजनीति, नैतिकता, फरेब और समाज की क्रूर विसंगतियों पर तीखी समीक्षा मौजूद थी। उनकी पंक्ति "झंडे रह जाएंगे, आदमी नहीं..." मनुष्य की नश्वरता और उसके विचारों के स्थायित्व को बेहद सशक्त ढंग से व्यक्त करती है। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद और परंपरा के बीच गहरी खाई थी — मालवीय ने इसी खाई पर पुल बनाने का काम किया।

साहित्यिक सम्मान और विरासत

उनके इसी अद्वितीय योगदान के कारण प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ सिंह उन्हें आदरपूर्वक 'नवगीत का भागीरथ' कहा करते थे — वह उपाधि जो उनकी साहित्यिक भूमिका को सटीक रूप से परिभाषित करती है। कवि-सम्मेलनों के संजीदा संचालक के रूप में भी वे अपनी अलग पहचान रखते थे।

परिवार की साहित्यिक परंपरा

11 नवंबर 1982 को उमाकांत मालवीय ने इस संसार से विदाई ली। परंतु उनकी साहित्यिक विरासत आज भी जीवित है — उनके परिवार की दूसरी पीढ़ी में यश मालवीय और अंशु मालवीय इस परंपरा को अनवरत आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी रचनाएँ हिंदी नवगीत के इतिहास में एक स्थायी अध्याय बन चुकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस साहित्यिक संघर्ष की है जो आज भी प्रासंगिक है — जब 'लोकप्रिय' और 'गंभीर' के बीच की खाई को पाटने की ज़रूरत हो। नई कविता के वर्चस्व के दौर में गीत-विधा की पैरवी करना साहित्यिक साहस था, न कि पुरातनपंथ। यह विडंबना है कि हिंदी के पाठ्यक्रमों और आलोचना-ग्रंथों में नवगीत आंदोलन को वह केंद्रीय स्थान अभी तक नहीं मिला जिसका वह हकदार है। मालवीय जैसे कवियों का पुनर्मूल्यांकन हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की एक अधूरी ज़िम्मेदारी है।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उमाकांत मालवीय कौन थे?
उमाकांत मालवीय हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित नवगीतकार थे, जिनका जन्म 2 अगस्त 1931 को मुंबई में हुआ था। उन्हें 'नवगीत का भागीरथ' कहा जाता है और वे 'एक चाय की चुस्की' जैसी कालजयी कविता के रचयिता हैं।
उमाकांत मालवीय को 'नवगीत का भागीरथ' क्यों कहा जाता है?
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ सिंह ने उन्हें यह उपाधि दी, क्योंकि मालवीय ने साठ के दशक में 'नई कविता' के वर्चस्व के बीच नवगीत को बौद्धिक और काव्यात्मक रूप से उसके समकक्ष स्थापित किया। उन्होंने गीत-विधा में जीवन, राजनीति और सामाजिक विसंगतियों की तीखी समीक्षा प्रस्तुत की।
उमाकांत मालवीय का निधन कब हुआ?
उमाकांत मालवीय का निधन 11 नवंबर 1982 को हुआ। उनके बाद उनकी साहित्यिक विरासत को यश मालवीय और अंशु मालवीय आगे बढ़ा रहे हैं।
उमाकांत मालवीय का 'परिमल' संस्था से क्या संबंध था?
'परिमल' नई कविता और नवलेखन की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था थी, जिससे जुड़कर मालवीय ने अपनी वैचारिक और रचनात्मक क्षमता को निखारा। इसी मंच ने उन्हें अपने समकालीन कवियों से संवाद और बहस का अवसर दिया।
उमाकांत मालवीय की सबसे प्रसिद्ध काव्य-पंक्तियाँ कौन-सी हैं?
उनकी दो पंक्तियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं — 'एक चाय की चुस्की, एक कहकहा, अपना तो इतना सामान ही रहा' और 'झंडे रह जाएंगे, आदमी नहीं...'। पहली पंक्ति जीवन के सहज दर्शन को और दूसरी मनुष्य की नश्वरता को अत्यंत सशक्त ढंग से व्यक्त करती है।
राष्ट्र प्रेस
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