आईसीएमआर के शोधकर्ताओं ने फंगल पैथोजन से निपटने का नया तरीका विकसित किया?

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आईसीएमआर के शोधकर्ताओं ने फंगल पैथोजन से निपटने का नया तरीका विकसित किया?

सारांश

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कैंडिडा एल्बिकेंस से निपटने के लिए एक नया दृष्टिकोण पेश किया है। यह शोध न केवल चिकित्सा जगत में एक क्रांतिकारी कदम है, बल्कि इससे रोगियों की जीवन दर में सुधार की संभावना भी है। जानिए कैसे इस नए तरीके से फंगल संक्रमण को नियंत्रित किया जा सकता है।

मुख्य बातें

आईसीएमआर ने कैंडिडा एल्बिकेंस के खिलाफ नया तरीका खोजा है।
यह शोध सिस्टमिक कैंडिडिआसिस के मामलों को नियंत्रित कर सकता है।
बड़ी संख्या में कैंडिडा संक्रमण से प्रभावित लोगों को राहत मिल सकती है।
अनुसंधान में प्रयोगात्मक सत्यापन और कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग का उपयोग किया गया है।
इससे रोगियों की जीवन दर में सुधार की उम्मीद है।

नई दिल्ली, 17 सितंबर (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों की टीम ने एक अनूठा तरीका खोजा है जिससे 'कैंडिडा एल्बिकेंस' (सीएएल) नामक फंगल पैथोजन से निपटने में मदद मिलेगी।

कैंडिडा एल्बिकेंस, सिस्टमिक कैंडिडिआसिस का मुख्य कारण है, जो वैश्विक स्तर पर एक गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन गया है और गंभीर मामलों में मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

इस अनुसंधान में वाधवानी स्कूल ऑफ डेटा साइंस एंड एआई (डब्ल्यूएसएआई) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के विशेषज्ञ शामिल थे। उन्होंने बहुविषयक दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए ऐसे महत्वपूर्ण मेटाबॉलिक पाथवे की पहचान की जिन्हें टारगेट करके इस पैथोजन को नियंत्रित किया जा सकता है।

टीम ने सीएएल में अज्ञात चयापचय कमजोरियों की पहचान के लिए बड़े पैमाने पर कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग और एक्सपेरिमेंटल वैलिडेशन (प्रायोगिक सत्यापन) को मिलाया।

इस शोध की प्रमुख अन्वेषक, मुंबई स्थित आईसीएमआर-एनआईआरआरसीएच की वैज्ञानिक डॉ. सुसान थॉमस ने कहा, "अन्य अध्ययनों के विपरीत, सीएएल मॉडल को आईआरवी781 जैसे अनूठे इंटीग्रेटेड होस्ट-फंगल मेटाबॉलिक मॉडल के साथ मिलाया गया है।"

डॉ. थॉमस ने बताया कि इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि होस्ट संक्रमण के दौरान सीएएल मेटाबोलिज्म कैसे प्रतिक्रिया करता है, और प्रयोगशाला में छिपी हुई मेटाबॉलिज्म कमजोरियों का पता लगाने में सहायता मिली। इसके साथ ही, सीएएल पैथोजन में आर्जिनिन मेटाबॉलिज्म की भूमिका को भी उजागर किया गया।

आईआईटी मद्रास के डब्ल्यूएसएआई के प्रोफेसर कार्तिक रमन ने कहा, "यह शोध एंटीफंगल दवाओं में विविधता लाने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य मरीजों की जीवन दर को बढ़ाना और उपचार की लागत को कम करना है।"

ये निष्कर्ष सेल कम्युनिकेशन एंड सिग्नलिंग नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं, जो भारत की अंतःविषय अनुसंधान में बढ़ती ताकत और समाधान प्रदान करने की क्षमता को दर्शाते हैं।

कैंडिडा एल्बिकेंस एक कवक की प्रजाति है, जो सामान्यतः मानव शरीर में उपस्थित होती है, लेकिन यह स्वस्थ व्यक्तियों को नुकसान नहीं पहुंचाती। यह मुंह, गले, आंत, योनि और त्वचा पर सामान्यतः पाई जाती है।

हालांकि, यह 'सिस्टमिक कैंडिडिआसिस' का कारण बन सकती है, जो एक गंभीर फंगल संक्रमण है, जिससे रक्तप्रवाह और आंतरिक अंगों में संक्रमण फैल सकता है।

भारत में आक्रामक कैंडिडिआसिस के मामले लगभग 4 लाख 70 हजार हैं। वैश्विक स्तर पर, हर साल लगभग 15,65,000 व्यक्तियों को कैंडिडा रक्तप्रवाह संक्रमण का सामना करना पड़ता है, जिससे 9,95,000 मौतें होती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह वैश्विक स्वास्थ्य चिंताओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है। हमारे देश में रिसर्च और विकास की क्षमता को और मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि हम स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का प्रभावी समाधान खोज सकें।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कैंडिडा एल्बिकेंस क्या है?
कैंडिडा एल्बिकेंस एक फंगल पैथोजन है जो सिस्टमिक कैंडिडिआसिस का मुख्य कारण है।
यह शोध क्यों महत्वपूर्ण है?
यह शोध एंटीफंगल दवाओं में विविधता लाने और रोगियों की जीवन दर को सुधारने में मदद करेगा।
भारत में कैंडिडिआसिस के मामले कितने हैं?
भारत में आक्रामक कैंडिडिआसिस की वार्षिक घटना लगभग 4 लाख 70 हजार है।
यह शोध किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है?
यह शोध सेल कम्युनिकेशन एंड सिग्नलिंग नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
कैंडिडा एल्बिकेंस से निपटने का नया तरीका क्या है?
शोधकर्ताओं ने बहुविषयक दृष्टिकोण से मेटाबॉलिक पाथवे की पहचान की है, जिससे इस पैथोजन को नियंत्रित किया जा सके।
राष्ट्र प्रेस
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