कर अपील सीमा बढ़ने से विवादित कर मांग में ₹16,690 करोड़ की गिरावट: निर्मला सीतारमण
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 3 अगस्त 2026 को लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि विभागीय कर विवादों में अपील दायर करने की मौद्रिक सीमा बढ़ाए जाने के बाद देश में विवादित कर मांग में कुल ₹16,690 करोड़ की अनुमानित कमी दर्ज की गई है। यह कदम केंद्रीय बजट 2024-25 के तहत उठाया गया था, जिसका उद्देश्य आयकर अपीलीय मंचों पर लंबित मामलों का बोझ घटाना था।
मुख्य घटनाक्रम
17 सितंबर 2024 से लागू नई मौद्रिक सीमाओं के अनुसार, आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) के लिए अपील की सीमा ₹60 लाख, उच्च न्यायालयों के लिए ₹2 करोड़ और सर्वोच्च न्यायालय के लिए ₹5 करोड़ निर्धारित की गई है। इन सीमाओं के लागू होने के बाद आयकर विभाग ने बड़ी संख्या में अपीलें या तो वापस लीं या दायर ही नहीं कीं।
मंच-वार आँकड़े
आयकर अपीलीय अधिकरण में 443 मामले वापस लिए गए और 11,390 अपीलें दायर नहीं की गईं, जिससे विवादित कर मांग में ₹3,662.82 करोड़ की कमी आई। उच्च न्यायालयों में 4,791 मामले वापस लिए गए और 5,565 अपीलें नहीं दायर की गईं — इससे ₹9,218.71 करोड़ की कमी दर्ज हुई। सर्वोच्च न्यायालय में 744 मामले वापस लिए गए और 534 मामलों में अपील नहीं की गई, जिसके चलते ₹3,807.15 करोड़ की कमी आई।
व्यापक कर सुधारों का संदर्भ
वित्त मंत्री ने बताया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने पिछले 12 वर्षों में कर अनुपालन को सरल बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें पहले से भरे हुए आयकर रिटर्न, संशोधित फॉर्म 26AS, अद्यतन रिटर्न दाखिल करने की सुविधा, फेसलेस निर्धारण एवं अपील प्रणाली, और अनुमानित कराधान योजना का विस्तार शामिल हैं। रिटर्न न भरने वालों पर लागू उच्च TDS/TCS प्रावधानों को भी हटाया गया है।
आम करदाता पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार पर न्यायिक प्रणाली में कर विवादों का बोझ कम करने का दबाव लगातार बना हुआ है। गौरतलब है कि भारत में लाखों कर विवाद वर्षों से विभिन्न अपीलीय मंचों पर लंबित रहते हैं, जिससे करदाताओं को अनिश्चितता और वित्तीय दबाव झेलना पड़ता है। मौद्रिक सीमा बढ़ाने से छोटे करदाताओं के मामले अब विभागीय अपील के दायरे से बाहर हो गए हैं, जो उनके लिए राहत की बात है।
क्या होगा आगे
सरकार के अनुसार, इन सुधारों से न केवल अपीलीय मंचों पर मामलों की संख्या घटेगी, बल्कि कर विवाद निपटान की प्रक्रिया भी तेज होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सीमाओं को नियमित रूप से अद्यतन किया जाता रहा, तो न्यायिक संसाधनों पर दीर्घकालिक दबाव में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।