7 नवंबर 2026
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बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ उम्र-धोखाधड़ी की एफआईआर अर्जी जम्मू कोर्ट ने खारिज की

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बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ उम्र-धोखाधड़ी की एफआईआर अर्जी जम्मू कोर्ट ने खारिज की

सारांश

जम्मू कोर्ट ने बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ उम्र-धोखाधड़ी की एफआईआर की माँग वाली याचिका खारिज कर दी। पुलिस जाँच में उनके सरकारी दस्तावेजों में जन्मतिथि एकसमान पाई गई और कोई अनुचित लाभ साबित नहीं हुआ।

मुख्य बातें

जम्मू के सब-जज एवं स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट संदीप सिंह सेन ने बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के विरुद्ध एफआईआर की माँग वाली याचिका खारिज की।
याचिकाकर्ता सुदर्शन मेहता ने दावा किया था कि मन्हास ने जूनियर क्रिकेट में चयन के लिए दो भिन्न जन्मतिथियों का उपयोग किया — स्कूल रिकॉर्ड में 9 दिसंबर 1977 और डीडीसीए वेबसाइट पर 12 अक्टूबर 1979 ।
पुलिस जाँच में मन्हास की जन्मतिथि सीबीएसई, पैन कार्ड, आधार कार्ड और ओएनजीसी रिकॉर्ड — सभी में एकसमान 12 सितंबर 1977 पाई गई।
अदालत ने माना कि शिकायत में डीडीसीए वेबसाइट की फोटोकॉपी के अतिरिक्त कोई प्रमाणित मूल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक जालसाजी के लिए बेईमानी के इरादे से झूठा दस्तावेज बनाने का साक्ष्य आवश्यक है, जो इस मामले में पहली नज़र में अनुपस्थित था।

जम्मू के सब-जज एवं स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट संदीप सिंह सेन की अदालत ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष मिथुन मन्हास के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की माँग वाली याचिका 7 नवंबर 2026 को खारिज कर दी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि मन्हास ने एज-ग्रुप क्रिकेट में अनुचित लाभ उठाने के लिए अपनी जन्मतिथि में हेरफेर की थी, जिसे अदालत ने पुलिस जाँच रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर पहली नज़र में असाबित पाया।

आरोप का पृष्ठभूमि

इस साल अगस्त 2026 में सेवानिवृत्त वरिष्ठ उप-पुलिस अधीक्षक और जम्मू एंड कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के पूर्व संयुक्त सचिव सुदर्शन मेहता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 175(3) के अंतर्गत अर्जी दायर की थी।

मेहता का दावा था कि दिल्ली के पूर्व बल्लेबाज मन्हास ने जेकेसीए और दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) के तहत राष्ट्रीय सब-जूनियर एवं जूनियर टूर्नामेंट में चयन के लिए दो भिन्न जन्मतिथियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कॉलेजिएट (एमएचएसी) स्कूल, नागबनी के एक ईमेल का हवाला देते हुए कहा कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि 9 दिसंबर 1977 दर्ज है, जबकि डीडीसीए की वेबसाइट पर 12 अक्टूबर 1979 अंकित है।

पुलिस जाँच के निष्कर्ष

अदालत के निर्देश पर नोवाबाद पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर ने फैक्ट रिपोर्ट प्रस्तुत की। जाँच में पाया गया कि मन्हास की जन्मतिथि उनकी सीबीएसई मार्कशीट, पैन कार्ड, आधार कार्ड और उनके नियोक्ता ओएनजीसी के आधिकारिक रिकॉर्ड — सभी में एकसमान 12 सितंबर 1977 दर्ज है।

रिपोर्ट में यह भी निष्कर्ष निकाला गया कि कथित विसंगति के कारण मन्हास को जूनियर क्रिकेट में कोई अनुचित लाभ नहीं मिला और किसी क्रिकेट संस्था ने उन्हें जन्मतिथि के आधार पर कोई विशेष अधिकार या छूट नहीं दी।

अदालत का तर्क और आदेश

अपने आदेश में कोर्ट ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने अपनी अर्जी में मुख्यतः डीडीसीए वेबसाइट से डाउनलोड की गई सामग्री की फोटोकॉपी प्रस्तुत की थी — कोई मूल या प्रमाणित दस्तावेज नहीं जिससे यह सिद्ध हो कि मन्हास ने कोई जाली प्रमाणपत्र जमा किया या कोई असत्य घोषणा की।

कोर्ट ने स्पष्ट किया, 'सिर्फ दो प्रविष्टियों में अंतर, और कुछ नहीं, अपने आप में जालसाजी या मनगढ़ंत दस्तावेज का प्रमाण नहीं बनता। आपराधिक जालसाजी कानून के अंतर्गत यह दर्शाना आवश्यक है कि बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से कोई झूठा दस्तावेज बनाया गया था।'

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेबसाइट की सामग्री से अधिकतम एक सवाल उठाया जा सकता है जिसके लिए संबंधित एसोसिएशन से सत्यापन की आवश्यकता होगी — इसे उम्र या किसी अन्य प्रकार की जालसाजी का निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

प्री-कॉग्निजेंस जाँच की सीमाएँ

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पूर्व-संज्ञान अवस्था में जाँच का निर्देश देने की शक्ति का उपयोग असत्यापित अनुमानों और कल्पनाओं पर आधारित निजी शिकायतों के निपटारे के लिए नहीं होना चाहिए। रिकॉर्ड पर पहली नज़र में कोई ऐसा साक्ष्य न होने के कारण कि मन्हास ने कोई जाली दस्तावेज तैयार किया या जानबूझकर कोई असत्य बयान दिया, अदालत ने याचिका को कमज़ोर मानते हुए खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि मेहता ने पहले नोवाबाद पुलिस स्टेशन और जम्मू के एसपी सिटी नॉर्थ को भी शिकायत दी थी, परंतु कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने न्यायालय का रुख किया था। इस फैसले के साथ मन्हास के विरुद्ध यह आरोप कानूनी कसौटी पर अब तक असाबित रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसके शीर्ष पर बैठे व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगे। कोर्ट का फैसला साक्ष्य की कसौटी पर सही हो सकता है, लेकिन डीडीसीए वेबसाइट पर दर्ज भिन्न तिथि की सार्वजनिक व्याख्या बोर्ड ने आज तक पारदर्शी तरीके से नहीं दी। पारदर्शिता की यह कमी ही भविष्य में ऐसी शिकायतों की ज़मीन तैयार करती रहेगी।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मिथुन मन्हास के खिलाफ उम्र-धोखाधड़ी की एफआईआर अर्जी क्यों खारिज हुई?
जम्मू कोर्ट ने याचिका खारिज की क्योंकि पुलिस जाँच में मन्हास की जन्मतिथि उनके सभी प्रमुख सरकारी दस्तावेजों में एकसमान पाई गई और कोई जाली दस्तावेज या बेईमानी का इरादा साबित नहीं हुआ। शिकायतकर्ता के पास वेबसाइट की फोटोकॉपी के अलावा कोई प्रमाणित मूल दस्तावेज नहीं था।
मिथुन मन्हास की जन्मतिथि विवाद क्या था?
शिकायतकर्ता का आरोप था कि एमएचएसी स्कूल नागबनी के रिकॉर्ड में मन्हास की जन्मतिथि 9 दिसंबर 1977 है, जबकि डीडीसीए वेबसाइट पर 12 अक्टूबर 1979 दर्ज है। पुलिस जाँच में हालाँकि उनके सीबीएसई, पैन, आधार और ओएनजीसी रिकॉर्ड में जन्मतिथि 12 सितंबर 1977 एकसमान मिली।
यह अर्जी किसने दायर की थी और किस आधार पर?
सेवानिवृत्त वरिष्ठ उप-पुलिस अधीक्षक और जेकेसीए के पूर्व संयुक्त सचिव सुदर्शन मेहता ने बीएनएसएस 2023 की धारा 175(3) के तहत अर्जी दायर की थी। उन्होंने धोखाधड़ी, चीटिंग और जालसाजी के आरोप लगाए थे।
अदालत ने जालसाजी के आरोप को लेकर क्या कानूनी सिद्धांत दोहराया?
अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक जालसाजी के लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से कोई झूठा दस्तावेज तैयार किया गया हो। केवल दो प्रविष्टियों में अंतर, बिना इरादे के प्रमाण के, जालसाजी का निष्कर्ष नहीं बनता।
इस फैसले का बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास पर क्या असर होगा?
फिलहाल उनके विरुद्ध यह आरोप कानूनी कसौटी पर असाबित रहे हैं और एफआईआर की माँग खारिज हो चुकी है। हालाँकि डीडीसीए वेबसाइट पर दर्ज भिन्न जन्मतिथि की सार्वजनिक व्याख्या अभी तक नहीं आई है, इसलिए यह मसला पूरी तरह बंद नहीं माना जा रहा।
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