बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ उम्र-धोखाधड़ी की एफआईआर अर्जी जम्मू कोर्ट ने खारिज की
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू के सब-जज एवं स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट संदीप सिंह सेन की अदालत ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष मिथुन मन्हास के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की माँग वाली याचिका 7 नवंबर 2026 को खारिज कर दी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि मन्हास ने एज-ग्रुप क्रिकेट में अनुचित लाभ उठाने के लिए अपनी जन्मतिथि में हेरफेर की थी, जिसे अदालत ने पुलिस जाँच रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर पहली नज़र में असाबित पाया।
आरोप का पृष्ठभूमि
इस साल अगस्त 2026 में सेवानिवृत्त वरिष्ठ उप-पुलिस अधीक्षक और जम्मू एंड कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के पूर्व संयुक्त सचिव सुदर्शन मेहता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 175(3) के अंतर्गत अर्जी दायर की थी।
मेहता का दावा था कि दिल्ली के पूर्व बल्लेबाज मन्हास ने जेकेसीए और दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) के तहत राष्ट्रीय सब-जूनियर एवं जूनियर टूर्नामेंट में चयन के लिए दो भिन्न जन्मतिथियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कॉलेजिएट (एमएचएसी) स्कूल, नागबनी के एक ईमेल का हवाला देते हुए कहा कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि 9 दिसंबर 1977 दर्ज है, जबकि डीडीसीए की वेबसाइट पर 12 अक्टूबर 1979 अंकित है।
पुलिस जाँच के निष्कर्ष
अदालत के निर्देश पर नोवाबाद पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर ने फैक्ट रिपोर्ट प्रस्तुत की। जाँच में पाया गया कि मन्हास की जन्मतिथि उनकी सीबीएसई मार्कशीट, पैन कार्ड, आधार कार्ड और उनके नियोक्ता ओएनजीसी के आधिकारिक रिकॉर्ड — सभी में एकसमान 12 सितंबर 1977 दर्ज है।
रिपोर्ट में यह भी निष्कर्ष निकाला गया कि कथित विसंगति के कारण मन्हास को जूनियर क्रिकेट में कोई अनुचित लाभ नहीं मिला और किसी क्रिकेट संस्था ने उन्हें जन्मतिथि के आधार पर कोई विशेष अधिकार या छूट नहीं दी।
अदालत का तर्क और आदेश
अपने आदेश में कोर्ट ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता ने अपनी अर्जी में मुख्यतः डीडीसीए वेबसाइट से डाउनलोड की गई सामग्री की फोटोकॉपी प्रस्तुत की थी — कोई मूल या प्रमाणित दस्तावेज नहीं जिससे यह सिद्ध हो कि मन्हास ने कोई जाली प्रमाणपत्र जमा किया या कोई असत्य घोषणा की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया, 'सिर्फ दो प्रविष्टियों में अंतर, और कुछ नहीं, अपने आप में जालसाजी या मनगढ़ंत दस्तावेज का प्रमाण नहीं बनता। आपराधिक जालसाजी कानून के अंतर्गत यह दर्शाना आवश्यक है कि बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से कोई झूठा दस्तावेज बनाया गया था।'
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेबसाइट की सामग्री से अधिकतम एक सवाल उठाया जा सकता है जिसके लिए संबंधित एसोसिएशन से सत्यापन की आवश्यकता होगी — इसे उम्र या किसी अन्य प्रकार की जालसाजी का निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
प्री-कॉग्निजेंस जाँच की सीमाएँ
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पूर्व-संज्ञान अवस्था में जाँच का निर्देश देने की शक्ति का उपयोग असत्यापित अनुमानों और कल्पनाओं पर आधारित निजी शिकायतों के निपटारे के लिए नहीं होना चाहिए। रिकॉर्ड पर पहली नज़र में कोई ऐसा साक्ष्य न होने के कारण कि मन्हास ने कोई जाली दस्तावेज तैयार किया या जानबूझकर कोई असत्य बयान दिया, अदालत ने याचिका को कमज़ोर मानते हुए खारिज कर दिया।
गौरतलब है कि मेहता ने पहले नोवाबाद पुलिस स्टेशन और जम्मू के एसपी सिटी नॉर्थ को भी शिकायत दी थी, परंतु कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने न्यायालय का रुख किया था। इस फैसले के साथ मन्हास के विरुद्ध यह आरोप कानूनी कसौटी पर अब तक असाबित रहे हैं।