एम. वी. श्रीधर: रणजी में 366 रन की पारी और 21 शतक, फिर भी टीम इंडिया का दरवाज़ा नहीं खुला
सारांश
मुख्य बातें
एम. वी. श्रीधर भारतीय घरेलू क्रिकेट के उन विरले बल्लेबाज़ों में गिने जाते हैं, जिन्होंने हैदराबाद की ओर से 97 प्रथम श्रेणी मैचों में 21 शतक और 6,701 रन बनाए, फिर भी राष्ट्रीय टीम का दरवाज़ा उनके लिए कभी नहीं खुल सका। 1993-94 की रणजी ट्रॉफी में आंध्रप्रदेश के विरुद्ध उनकी 366 रन की ऐतिहासिक पारी आज भी घरेलू क्रिकेट की यादगार उपलब्धियों में दर्ज है।
प्रारंभिक जीवन और क्रिकेट की शुरुआत
मंचाला वेंकट श्रीधर का जन्म 2 अगस्त 1966 को विजयवाड़ा में हुआ था। बचपन से ही क्रिकेट के प्रति उनका गहरा लगाव था। वह दाएं हाथ के बल्लेबाज़ थे और ज़रूरत पड़ने पर दाएं हाथ की पार्ट-टाइम ऑफ स्पिन गेंदबाज़ी भी करते थे। 1988-89 के सत्र में उन्होंने हैदराबाद की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया और जल्द ही टीम के अहम बल्लेबाज़ के रूप में पहचान बनाई।
घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड प्रदर्शन
श्रीधर का घरेलू करियर करीब दस वर्षों तक चला। इस दौरान उन्होंने 97 प्रथम श्रेणी मैचों की 150 पारियों में 21 शतक और 27 अर्धशतक की मदद से 6,701 रन बनाए। उनके बल्ले से एक तिहरा शतक भी निकला, जो किसी भी बल्लेबाज़ की श्रेष्ठता का प्रमाण होता है।
उनके करियर का सर्वोच्च क्षण 1993-94 की रणजी ट्रॉफी में आया, जब उन्होंने आंध्रप्रदेश के खिलाफ 366 रन की विशाल पारी खेली — यह उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ स्कोर रहा। इस पारी ने उन्हें घरेलू क्रिकेट में एक सम्मानित और लोकप्रिय बल्लेबाज़ के रूप में स्थापित कर दिया। 1998-99 के सत्र में उन्होंने हैदराबाद के लिए अपना आखिरी मैच खेला।
राष्ट्रीय टीम से वंचित रहे
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय क्रिकेट में चयन प्रक्रिया पर बहस आज भी जारी रहती है। श्रीधर का उदाहरण उन कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की याद दिलाता है, जिन्होंने घरेलू क्रिकेट में असाधारण प्रदर्शन किया, लेकिन राष्ट्रीय टीम में प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं पा सके। गौरतलब है कि 366 रन की पारी के बावजूद उन्हें भारतीय टीम में जगह नहीं मिली, जो उनके करियर की सबसे बड़ी विडंबना मानी जाती है।
बीसीसीआई में भूमिका और निधन
क्रिकेट से संन्यास के बाद श्रीधर ने प्रशासनिक क्षेत्र में कदम रखा। 2013 में एन. श्रीनिवासन के कार्यकाल के दौरान उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के जनरल मैनेजर का पद संभाला, हालांकि उसी वर्ष सितंबर में उन्होंने यह पद छोड़ दिया।
दुखद रूप से, 30 अक्टूबर 2017 को मात्र 51 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। वह अपने पीछे पत्नी, एक बेटे और एक बेटी को छोड़ गए। हैदराबाद क्रिकेट के इस दिग्गज को आज भी घरेलू सर्किट में असाधारण प्रतिभा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
विरासत और महत्व
श्रीधर की कहानी भारतीय क्रिकेट की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ घरेलू स्तर पर शानदार प्रदर्शन भी राष्ट्रीय टीम में चयन की गारंटी नहीं देता। उनकी 366 रन की पारी और 21 शतकों की विरासत हैदराबाद क्रिकेट की स्वर्णिम स्मृतियों में अंकित है, और आने वाली पीढ़ियों के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।