रवींद्रनाथ टैगोर की 164वीं जयंती: 'लक्ष्मण रेखा' के डर से नोबेल तक का सफर

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रवींद्रनाथ टैगोर की 164वीं जयंती: 'लक्ष्मण रेखा' के डर से नोबेल तक का सफर

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाको स्थित महलनुमा ठाकुर भवन में हुआ था। वे देवेंद्रनाथ ठाकुर और सारदा देवी की 14वीं संतान थे — एक ऐसे प्रतिष्ठित बंगाली खानदान में, जिसका रुतबा पूरे बंगाल में फैला हुआ था। उस दिन किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह बालक एक दिन एशिया का पहला नोबेल पुरस्कार विजेता बनेगा।

नौकर-शासन और लक्ष्मण रेखा का भय

माँ सारदा देवी की तबीयत प्रायः खराब रहती थी, इसलिए छोटे रवींद्र का लालन-पालन मुख्यतः घरेलू नौकरों के हाथों हुआ। बचपन में वे इतने नटखट थे कि नौकर भी उनसे परेशान हो जाते थे। उन्हें काबू में रखने के लिए नौकरों ने रामायण के 'सीता हरण' प्रसंग का सहारा लिया — ज़मीन पर एक चौक बनाकर उसके भीतर खड़ा कर दिया जाता और चेतावनी दी जाती कि घेरे से बाहर निकले तो रावण उठाकर ले जाएगा।

उस बाल मन पर इस कहानी का गहरा असर पड़ा। टैगोर ने बहुत बाद में अपने बचपन को याद करते हुए लिखा,

राष्ट्र प्रेस
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