29 अगस्त 2026 पंचांग: भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा पर सुकर्मा योग, जानें अभिजीत मुहूर्त और राहुकाल
सारांश
मुख्य बातें
29 अगस्त 2026, शनिवार को हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। श्रावण पूर्णिमा के ठीक बाद आने वाला यह दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन पूर्व भाद्रपद नक्षत्र और सुकर्मा योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन पूजा-पाठ, ध्यान और शुभ कार्यों की योजना बनाने का उत्तम अवसर है।
तिथि, नक्षत्र और योग का विवरण
प्रतिपदा तिथि सुबह 9 बजकर 58 मिनट तक रहेगी, जिसके पश्चात द्वितीया तिथि प्रारंभ होगी। पूर्व भाद्रपद नक्षत्र रात 3 बजकर 43 मिनट तक प्रभावी रहेगा। सुकर्मा योग सुबह 6 बजकर 37 मिनट तक रहेगा। करण कौलव सुबह 9 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। सूर्य इस दिन सिंह राशि में और चंद्रमा कुंभ राशि में स्थित रहेंगे।
सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्र समय
दिन की शुरुआत सुबह 5 बजकर 38 मिनट पर सूर्योदय के साथ होगी और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 21 मिनट पर होगा। चंद्रोदय शाम 7 बजे होगा, जबकि चंद्रास्त अगले दिन यानी 30 अगस्त की सुबह 6 बजकर 27 मिनट पर होगा।
शुभ मुहूर्त और अशुभ काल
अभिजीत मुहूर्त — जो दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है — सुबह 11 बजकर 35 मिनट से दोपहर 12 बजकर 25 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में शुरू किए गए कार्य सफल माने जाते हैं।
अशुभ काल की बात करें तो राहुकाल सुबह 8 बजकर 49 मिनट से 10 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। गुलिक काल सुबह 5 बजकर 38 मिनट से 7 बजकर 13 मिनट तक और यमघण्ट काल दोपहर 1 बजकर 35 मिनट से 3 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। इन अवधियों में महत्वपूर्ण कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए।
कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का धार्मिक महत्व
श्रावण पूर्णिमा के बाद आरंभ होने वाले भाद्रपद कृष्ण पक्ष को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है। प्रतिपदा तिथि पर इष्ट देव की पूजा, ध्यान और मंत्र जाप विशेष रूप से फलदायी बताए जाते हैं।
शनिवार और शनि देव की उपासना
शनिवार का दिन परंपरागत रूप से भगवान शनि देव को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन शनि मंत्र का जाप, जरूरतमंदों की सहायता और सरसों के तेल का दीपक जलाने से जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता आती है। श्रद्धालु तिल का दान करते हैं और शाम को पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक प्रज्वलित करते हैं — यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। यह दिन उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से गुजर रहे हैं।