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मनी लॉन्ड्रिंग मामला: जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली हाईकोर्ट से 3 दिन की कस्टडी पैरोल, अंतरिम जमानत नामंजूर

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मनी लॉन्ड्रिंग मामला: जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली हाईकोर्ट से 3 दिन की कस्टडी पैरोल, अंतरिम जमानत नामंजूर

सारांश

दिल्ली हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग में गिरफ्तार अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को स्टेज-4 कैंसर से जूझ रही पत्नी से मिलने के लिए सीमित कस्टडी पैरोल दी, लेकिन PMLA की सख्त धाराओं का हवाला देते हुए अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। ED का आरोप है कि ₹493.24 करोड़ की अवैध कमाई की गई।

मुख्य बातें

दिल्ली हाईकोर्ट ने जवाद अहमद सिद्दीकी को 21, 23 और 25 जुलाई को 3 दिन की कस्टडी पैरोल मंजूर की।
सिद्दीकी की छह सप्ताह की अंतरिम जमानत याचिका PMLA के कड़े प्रावधानों का हवाला देकर अस्वीकार की गई।
उनकी पत्नी उस्मा अख्तर स्टेज-4 ओवेरियन कैंसर से पीड़ित हैं; मेडिकल रिकॉर्ड में बीमारी 'स्थिर' बताई गई है।
ED के अनुसार 2016-17 से 2024-25 के बीच लगभग ₹493.24 करोड़ की अवैध कमाई का आरोप है।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर NAAC व UGC की फर्जी मान्यता दिखाने और NMC मंजूरी में अनियमितता के आरोप हैं।
साकेत विशेष अदालत ने भी 9 जून के आदेश में जमानत याचिका पहले ही खारिज कर दी थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2026 को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में न्यायिक हिरासत में बंद अल-फलाह यूनिवर्सिटी और अल-फलाह ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को उनकी कैंसर पीड़ित पत्नी से मिलने के लिए तीन दिन की कस्टडी पैरोल मंजूर की। हालाँकि, अदालत ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए उनकी अंतरिम जमानत याचिका अस्वीकार कर दी।

कस्टडी पैरोल की शर्तें

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने आदेश दिया कि सिद्दीकी को 21, 23 और 25 जुलाई को निर्धारित अवधि के लिए कस्टडी पैरोल पर अपनी पत्नी से मिलने की अनुमति होगी। यह राहत सीमित और शर्तों के अधीन है — पूर्ण जमानत का विकल्प नहीं।

सिद्दीकी ने अदालत में अपनी पत्नी उस्मा अख्तर की देखभाल के लिए छह सप्ताह की अंतरिम जमानत की माँग की थी। उस्मा अख्तर स्टेज-4 ओवेरियन कैंसर से पीड़ित हैं। सिद्दीकी के अनुसार, इस कठिन समय में उनकी पत्नी को उनके सहयोग की आवश्यकता है।

दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान सिद्दीकी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम चौधरी ने पक्ष रखा। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जोहेब हुसैन पेश हुए।

ED ने अंतरिम जमानत का कड़ा विरोध किया। जाँच एजेंसी का कहना था कि यह मामला गंभीर आर्थिक अपराधों से जुड़ा है और याचिकाकर्ता को राहत देने का कोई पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनता।

पहले भी मिल चुका है इनकार

यह पहली बार नहीं है जब सिद्दीकी की जमानत याचिका अस्वीकार हुई हो। इससे पहले साकेत स्थित विशेष अदालत ने भी उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। 9 जून के उस आदेश में अदालत ने माना था कि पत्नी स्टेज-4 कैंसर से पीड़ित हैं, किंतु उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड में कोई आपात या जीवन-रक्षक स्थिति नहीं पाई गई जो अंतरिम जमानत को अनिवार्य बनाती। अदालत ने यह भी नोट किया था कि चिकित्सा दस्तावेज़ों में बीमारी को 'स्थिर' बताया गया है और उपचार का सकारात्मक असर दिख रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि और आरोप

ED के अनुसार, यह जाँच दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज कई एफआईआर के आधार पर शुरू की गई थी। इन एफआईआर में अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उससे जुड़ी संस्थाओं पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप हैं।

जाँच एजेंसी का आरोप है कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने NAAC की समाप्त हो चुकी मान्यता को वैध बताकर प्रस्तुत किया और ऐसी UGC मान्यता का दावा किया जो वास्तव में थी ही नहीं। इसके अतिरिक्त, यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज पर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) से मंजूरी प्राप्त करने के लिए अनियमितताएँ करने का भी आरोप है।

ED का दावा है कि 2016-17 से 2024-25 के बीच लगभग ₹493.24 करोड़ की अवैध कमाई की गई। जाँच में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस धन को सिद्दीकी और उनके परिवार से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से स्थानांतरित किया गया।

आगे क्या होगा

अदालत का यह आदेश स्पष्ट करता है कि PMLA के कड़े प्रावधानों के तहत मानवीय आधार पर पूर्ण जमानत मिलना कठिन है, भले ही परिवार में गंभीर बीमारी हो। सिद्दीकी का मामला अब आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है, और ED की जाँच जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उच्च शिक्षा में जवाबदेही के सवाल तक ले जाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि NAAC और UGC जैसी नियामक संस्थाओं की निगरानी में चूक के बिना इस पैमाने की कथित धोखाधड़ी संभव नहीं होती — जो एक बड़ा प्रणालीगत प्रश्न है जो मुख्यधारा की कवरेज में प्रायः अनदेखा रह जाता है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जवाद अहमद सिद्दीकी को कस्टडी पैरोल क्यों दी गई?
दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें उनकी पत्नी उस्मा अख्तर से मिलने की अनुमति दी, जो स्टेज-4 ओवेरियन कैंसर से पीड़ित हैं। यह पैरोल 21, 23 और 25 जुलाई को निर्धारित अवधि के लिए दी गई है।
अंतरिम जमानत क्यों नहीं दी गई?
अदालत ने PMLA के तहत मामले की गंभीरता और कड़े कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार किया। ED ने भी तर्क दिया कि यह गंभीर आर्थिक अपराध का मामला है और राहत का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर क्या आरोप हैं?
ED का आरोप है कि यूनिवर्सिटी ने NAAC की समाप्त मान्यता को वैध बताया, फर्जी UGC मान्यता का दावा किया और NMC से मंजूरी में अनियमितताएँ कीं। 2016-17 से 2024-25 के बीच लगभग ₹493.24 करोड़ की अवैध कमाई का आरोप है।
इस मामले की सुनवाई किस अदालत ने की?
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले साकेत स्थित विशेष अदालत ने 9 जून के आदेश में भी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
ED की जाँच की शुरुआत कैसे हुई?
ED की जाँच दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज कई एफआईआर के आधार पर शुरू हुई, जिनमें अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उससे जुड़ी संस्थाओं पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए थे।
राष्ट्र प्रेस
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