16 सितंबर 2026
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मनी लॉन्ड्रिंग केस: सुप्रीम कोर्ट ने आलमगीर आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज की, ₹37.55 करोड़ नकद बरामदगी का मामला

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मनी लॉन्ड्रिंग केस: सुप्रीम कोर्ट ने आलमगीर आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज की, ₹37.55 करोड़ नकद बरामदगी का मामला

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को टेंडर घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में राहत देने से इनकार कर दिया। ₹37.55 करोड़ की नकद बरामदगी और कथित 3.2% कमीशन वसूली के आरोपों के बीच अब मामला विशेष पीएमएलए अदालत में आगे बढ़ेगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 16 सितंबर 2026 को आलमगीर आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज करने वाले झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागु की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
ईडी के अनुसार मई 2024 में तलाशी में कथित तौर पर ₹37.55 करोड़ नकद बरामद हुए थे।
एजेंसी का आरोप है कि टेंडर मूल्य का कथित 3.2% कमीशन वसूला जाता था, जिसमें तत्कालीन मंत्री का हिस्सा 1.5% था।
झारखंड उच्च न्यायालय ने 6 मई 2026 को डिस्चार्ज याचिका खारिज की थी; अब मामला पीएमएलए अदालत, रांची में मुकदमे के चरण में जाएगा।

झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को 16 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा, जब शीर्ष अदालत ने टेंडर घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज करने वाले झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागु की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की और आलम को आरोपों से मुक्त करने की माँग को अस्वीकार कर दिया।

मामले का घटनाक्रम

इस मामले में सबसे पहले रांची की विशेष पीएमएलए अदालत ने आलमगीर आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज की थी। इसके बाद उन्होंने झारखंड उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया, परंतु उच्च न्यायालय ने भी 6 मई 2026 के अपने फैसले में निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए उनकी याचिका ठुकरा दी। अब सर्वोच्च न्यायालय के इनकार के बाद आलम के लिए इस चरण में राहत के सभी रास्ते बंद हो गए हैं।

ईडी के आरोप और बरामदगी

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अनुसार, मई 2024 में विभिन्न ठिकानों पर की गई तलाशी के दौरान कथित तौर पर ₹37.55 करोड़ नकद बरामद हुए थे। एजेंसी के दस्तावेज़ों में यह दावा किया गया है। ईडी ने आरोप लगाया है कि ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर आवंटन के बदले ठेकेदारों से कथित रूप से कमीशन वसूला जाता था।

एजेंसी के अनुसार, कुल टेंडर मूल्य का कथित तौर पर लगभग 3.2 प्रतिशत कमीशन लिया जाता था, जिसमें से तत्कालीन मंत्री के लिए करीब 1.5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित था। उच्च न्यायालय के फैसले में ईडी की ओर से पेश बयानों और बरामद दस्तावेज़ों का उल्लेख किया गया है।

अदालत की टिप्पणी

झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने 6 मई 2026 के फैसले में स्पष्ट किया था कि डिस्चार्ज के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि आरोपी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। अदालत ने कहा था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस स्तर पर आलमगीर आलम की कथित भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि ये निष्कर्ष अंतिम दोषसिद्धि का फैसला नहीं हैं — ये केवल डिस्चार्ज के चरण में प्रथमदृष्टया साक्ष्य के आकलन से संबंधित हैं। मुकदमे के दौरान साक्ष्यों की विस्तृत जाँच अलग से होगी।

व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के कई मामले जाँच एजेंसियों के राडार पर हैं। आलमगीर आलम झारखंड सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे हैं और उनके खिलाफ यह कार्यवाही राज्य की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। ईडी की जाँच में ग्रामीण कार्य विभाग के टेंडर आवंटन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब मामला विशेष पीएमएलए अदालत, रांची में मुकदमे के चरण में आगे बढ़ेगा। ईडी के दस्तावेज़ों और बयानों की विस्तृत जाँच न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगी। यह मामला झारखंड में सरकारी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें टेंडर आवंटन और राजनीतिक संरक्षण के कथित गठजोड़ को दस्तावेज़ी साक्ष्य से जोड़ा गया है। हालाँकि डिस्चार्ज चरण में प्रथमदृष्टया आकलन और अंतिम दोषसिद्धि के बीच लंबा फासला होता है, यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि झारखंड में ग्रामीण विकास के टेंडर तंत्र की निगरानी व्यवस्था कितनी कमज़ोर रही है। ₹37.55 करोड़ की नकद बरामदगी जैसे आँकड़े सार्वजनिक जवाबदेही के व्यापक सवाल उठाते हैं। असली परीक्षा अब मुकदमे के दौरान साक्ष्यों की जाँच में होगी — जहाँ आरोप और वास्तविकता के बीच की रेखा तय होगी।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आलमगीर आलम का मनी लॉन्ड्रिंग मामला क्या है?
यह झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर आवंटन के बदले कथित कमीशन वसूली से जुड़ा पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग) मामला है। ईडी के अनुसार मई 2024 में तलाशी में ₹37.55 करोड़ नकद बरामद हुए थे और कुल टेंडर मूल्य का कथित 3.2% कमीशन वसूला जाता था।
सुप्रीम कोर्ट ने आलमगीर आलम की याचिका पर क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागु की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, जिसमें आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज की गई थी। इस तरह आलम को आरोपों से मुक्त करने की माँग भी अस्वीकार हो गई।
झारखंड उच्च न्यायालय ने डिस्चार्ज याचिका क्यों खारिज की थी?
झारखंड उच्च न्यायालय ने 6 मई 2026 के फैसले में कहा था कि डिस्चार्ज के चरण में केवल यह देखना होता है कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। ईडी की ओर से पेश दस्तावेज़ों और बयानों के आधार पर अदालत ने माना कि इस स्तर पर आलम की कथित भूमिका को खारिज नहीं किया जा सकता।
क्या सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आलमगीर आलम की दोषसिद्धि है?
नहीं। यह फैसला केवल डिस्चार्ज याचिका के संदर्भ में है और अंतिम दोषसिद्धि का निर्णय नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ये निष्कर्ष प्रथमदृष्टया साक्ष्य के आकलन तक सीमित हैं; मुकदमे के दौरान साक्ष्यों की विस्तृत जाँच अलग से होगी।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद मामला विशेष पीएमएलए अदालत, रांची में मुकदमे के चरण में आगे बढ़ेगा। वहाँ ईडी के दस्तावेज़ों, बयानों और बरामद साक्ष्यों की विस्तृत न्यायिक जाँच होगी।
राष्ट्र प्रेस
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