सुप्रीम कोर्ट का झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को बड़ा झटका, जमानत याचिका खारिज
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने आलमगीर आलम और संजीव लाल की जमानत याचिका खारिज की।
- मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया गया।
- आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी गई।
- ईडी ने 3,048 करोड़ रुपए के टेंडर घोटाले का आरोप लगाया।
- आलमगीर आलम 18 महीने से न्यायिक हिरासत में हैं।
नई दिल्ली, 2 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम और उनके निजी सचिव संजीव लाल की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला कथित टेंडर कमीशन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग की जांच से संबंधित है। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाई जाए।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दोनों आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया। ये दोनों आरोपित 18 महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं। बेंच ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुख्य गवाहों के बयान चार हफ्तों के भीतर दर्ज करे।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई की तिथि तब निर्धारित की जाएगी जब गवाहों से पूछताछ पूरी हो जाएगी।
सुनवाई के दौरान, आलम के वकील ने यह दलील दी कि उनके मुवक्किल मई 2024 से हिरासत में हैं। उन्होंने ट्रायल प्रक्रिया में हो रही देरी का उल्लेख किया, जो एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) द्वारा बार-बार पेश की जा रही सप्लीमेंट्री चार्जशीट के कारण है।
बचाव पक्ष ने अभियोजन की मंजूरी न होने का भी उल्लेख किया। हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
संजीव लाल, जो इसी आधार पर जमानत की मांग कर रहे थे, उन्हें भी फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है।
यह मामला ग्रामीण विकास विभाग में कथित अनियमितताओं की जांच से संबंधित है। 6 मई 2024 को ईडी ने संजीव लाल और उनके सहयोगी जहांगीर आलम के ठिकानों पर छापेमारी की, जिसमें 32.20 करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। इसके अलावा, लाल से 10.05 लाख रुपए और एक डायरी भी जब्त की गई, जिसमें कथित तौर पर कमीशन के लेन-देन का विवरण था।
जांच के बाद, 15 मई 2024 को आलमगीर आलम को गिरफ्तार किया गया। ईडी ने आरोप लगाया है कि सरकारी टेंडर आवंटित करने के बदले कमीशन वसूलने के लिए एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
एजेंसी के अनुसार, ठेकेदारों को कथित तौर पर कुल ठेके की कीमत का लगभग तीन प्रतिशत कमीशन देना पड़ता था। इसमें से, लगभग 1.35 प्रतिशत राशि तत्कालीन मंत्री तक उनके निजी सचिव के माध्यम से पहुंचाई जाती थी, जबकि 0.65 से 1 प्रतिशत राशि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों में बांटी जाती थी और शेष राशि इंजीनियरों सहित अन्य कर्मचारियों के बीच साझा की जाती थी।
ईडी का दावा है कि कथित घोटाले से 3,048 करोड़ रुपए के टेंडर आवंटन के संबंध में 90 करोड़ रुपए से अधिक की अवैध कमाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता पर जोर देते हुए आरोपी को जमानत देने से इनकार किया और त्वरित सुनवाई की आवश्यकता पर बल दिया।