28 जुलाई 2026
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एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक 2026: जितेंद्र सिंह बोले — अब 5 महीने में मिलेगी सज़ा, स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा

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एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक 2026: जितेंद्र सिंह बोले — अब 5 महीने में मिलेगी सज़ा, स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा

सारांश

लोकसभा में पेश एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक 2026 में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान है — जाँच दो महीने, ट्रायल तीन महीने, कुल पाँच महीने में सज़ा। जितेंद्र सिंह ने इसे करोड़ों प्रतियोगी छात्रों के भविष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा कदम बताया।

मुख्य बातें

28 जुलाई 2026 को लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हुई।
केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने विधेयक पेश किया; यह 2024 के मूल कानून में संशोधन है।
स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के तहत जाँच 2 महीने + ट्रायल 3 महीने = अधिकतम 5 महीने में फैसला।
अपील के लिए 30 दिन की समय-सीमा; हाईकोर्ट में डबल बेंच से सुनवाई नहीं होगी।
नंदन नीलेकणि टास्क फोर्स के सुझाव और राधाकृष्णन समिति की 46 में से 35 सिफारिशें पहले ही लागू।
कानून मंत्रालय ने फास्ट ट्रैक कोर्ट गठन की प्रक्रिया विधेयक पेश होते ही शुरू कर दी।

लोकसभा में 28 जुलाई 2026 को पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हुई। केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि इसका मकसद पेपर लीक, संगठित परीक्षा घोटालों और अन्य अनुचित गतिविधियों पर पहले से कहीं अधिक कड़ाई से अंकुश लगाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार लाखों छात्रों के भविष्य से किसी भी तरह का समझौता नहीं होने देगी।

विधेयक की पृष्ठभूमि

जितेंद्र सिंह ने बताया कि यह विधेयक पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 में संशोधन के लिए लाया गया है। 2024 का मूल कानून परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शुचिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया था, जिसे जून 2024 में लागू किया गया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के निर्देश के बाद सरकार यह संशोधन लेकर आई है ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूर्णतः रोक लगाई जा सके।

गौरतलब है कि 1992 में एक समिति ने केंद्रीय परीक्षा समिति बनाने की सिफारिश की थी और 2010 में एक अन्य समिति ने भी यही सुझाव दोहराया, लेकिन तत्कालीन सरकारों ने इन्हें लागू नहीं किया। मंत्री के अनुसार, वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) का गठन किया और पहली बार इस विषय पर व्यापक कानून बनाया।

स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट — मुख्य प्रावधान

जितेंद्र सिंह ने बताया कि इस संशोधन का सबसे अहम प्रावधान स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना है। इसके तहत पेपर लीक से जुड़े मामलों की जाँच दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी। इसके बाद ट्रायल कोर्ट में तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाया जाएगा — यानी घटना से लेकर सज़ा तक अधिकतम पाँच महीने का समय निर्धारित किया गया है।

इसके अतिरिक्त, यदि कोई पक्ष फैसले के विरुद्ध अपील करना चाहे तो उसे 30 दिनों के भीतर अपील दायर करनी होगी। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट में डबल बेंच से नहीं होगी। मंत्री ने यह भी बताया कि विधेयक पेश होने के साथ ही कानून मंत्रालय ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

विशेषज्ञ समितियों की भूमिका

नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिन्हें इस संशोधन में समाहित किया गया है। इसके अलावा राधाकृष्णन समिति की कुल 46 सिफारिशों में से 35 सिफारिशें सरकार पहले ही लागू कर चुकी है, शेष पर काम जारी है।

विपक्ष पर सरकार का पलटवार

जितेंद्र सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) पर निशाना साधते हुए कहा कि 2009 के रेलवे भर्ती परीक्षा पेपर लीक से लेकर 2012 के एम्स प्रवेश परीक्षा पेपर लीक तक कई बड़े मामले कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सामने आए। उन्होंने कहा कि पेपर लीक की घटनाएं किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रही हैं — अलग-अलग राज्यों और परीक्षाओं में पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे, लेकिन उस समय इतनी सख्त कार्रवाई नहीं होती थी।

आगे क्या होगा

विधेयक पर लोकसभा में चर्चा जारी है। सरकार को उम्मीद है कि इसके प्रावधानों पर व्यापक सहमति बनेगी, क्योंकि यह कानून करोड़ों प्रतियोगी छात्रों के हितों की रक्षा और परीक्षा प्रणाली में जनविश्वास बहाल करने के लिए लाया गया है। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, जो इस कानून की क्रियान्वयन गति का संकेत देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या न्यायिक बुनियादी ढाँचा इस समयसीमा को व्यवहार में पूरा कर सकेगा — भारत में पहले से ही फास्ट ट्रैक कोर्ट लंबित मामलों के बोझ तले दबे हैं। राधाकृष्णन समिति की 46 में से 35 सिफारिशें लागू होना प्रगति है, लेकिन शेष 11 पर चुप्पी चिंताजनक है। NTA के गठन के बावजूद 2024 में NEET पेपर लीक विवाद सामने आया — यह दर्शाता है कि संस्थागत सुधार के बिना केवल दंड-केंद्रित कानून पर्याप्त नहीं। विधेयक की असली परीक्षा पहले मामले के फैसले में होगी।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
यह पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 में संशोधन के लिए लाया गया विधेयक है, जिसे 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पेपर लीक और परीक्षा घोटालों पर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के ज़रिये पाँच महीने के भीतर सज़ा सुनिश्चित करना है।
स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में पेपर लीक मामलों की सुनवाई कैसे होगी?
विधेयक के अनुसार, पेपर लीक मामले की जाँच दो महीने में पूरी होगी और ट्रायल कोर्ट तीन महीने में फैसला सुनाएगा — कुल मिलाकर अधिकतम पाँच महीने में न्याय मिलेगा। अपील के लिए 30 दिन की समय-सीमा तय की गई है और हाईकोर्ट में डबल बेंच से सुनवाई नहीं होगी।
इस विधेयक में नंदन नीलेकणि और राधाकृष्णन समिति की क्या भूमिका है?
नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स ने परीक्षा सुधार पर कई अहम सुझाव दिए, जिन्हें इस संशोधन में शामिल किया गया है। राधाकृष्णन समिति की 46 सिफारिशों में से 35 सरकार पहले ही लागू कर चुकी है।
कांग्रेस के कार्यकाल में कौन-से बड़े पेपर लीक मामले सामने आए थे?
जितेंद्र सिंह ने 2009 के रेलवे भर्ती परीक्षा पेपर लीक और 2012 के एम्स प्रवेश परीक्षा पेपर लीक का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में इन घटनाओं पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, जबकि वर्तमान सरकार अब सख्त कानूनी ढाँचा तैयार कर रही है।
यह विधेयक छात्रों के लिए क्यों ज़रूरी है?
पेपर लीक की घटनाएं किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहीं — कई परीक्षाओं और राज्यों में इससे लाखों ईमानदार छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है। यह विधेयक त्वरित न्याय और कड़े दंड के ज़रिये परीक्षा प्रणाली में जनविश्वास बहाल करने का प्रयास है।
राष्ट्र प्रेस
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