28 जुलाई 2026
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पेपर लीक पर अब 5 महीने में फैसला: लोकसभा में जितेंद्र सिंह ने पेश किया संशोधन विधेयक 2026

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पेपर लीक पर अब 5 महीने में फैसला: लोकसभा में जितेंद्र सिंह ने पेश किया संशोधन विधेयक 2026

सारांश

पेपर लीक पर नकेल कसने के लिए सरकार ने लोकसभा में संशोधन विधेयक पेश किया — 2 महीने जाँच, 3 महीने ट्रायल, कुल 5 महीने में फैसला। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन शुरू, राधाकृष्णन समिति की 46 में से 35 सिफारिशें पहले ही लागू।

मुख्य बातें

केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया।
पेपर लीक मामलों में अब 2 महीने में जाँच और 3 महीने में ट्रायल — कुल 5 महीने में सज़ा का प्रावधान।
अपील के लिए 30 दिनों की समय सीमा; उच्च न्यायालय में डबल बेंच से सुनवाई नहीं होगी।
कानून मंत्रालय ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया विधेयक पेश होने के साथ ही शुरू की।
राधाकृष्णन समिति की 46 में से 35 सिफारिशें पहले ही लागू; नंदन नीलेकणि टास्क फोर्स के सुझाव भी शामिल।
मंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए 2009 रेलवे और 2012 एम्स पेपर लीक का हवाला दिया।

केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया, जिसके तहत पेपर लीक के दोषियों को अधिकतम पाँच महीने के भीतर सज़ा सुनाई जाएगी। विधेयक का उद्देश्य संगठित परीक्षा घोटालों पर लगाम लगाना और लाखों छात्रों के भविष्य की रक्षा करना है।

विधेयक में क्या है खास

इस संशोधन विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना है। इसके अंतर्गत पेपर लीक से जुड़े मामलों की जाँच दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी और ट्रायल कोर्ट में तीन महीने के भीतर फैसला सुनाया जाएगा — यानी घटना से लेकर सज़ा तक अधिकतम पाँच महीने का समय तय किया गया है।

यदि कोई पक्ष फैसले के विरुद्ध अपील करना चाहे तो उसे 30 दिनों के भीतर अपील दाखिल करनी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऐसे मामलों की सुनवाई उच्च न्यायालय में डबल बेंच से नहीं होगी।

2024 के कानून को और मज़बूत करने की ज़रूरत क्यों पड़ी

जितेंद्र सिंह ने बताया कि पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 को जून 2024 में लागू किया गया था, जो परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शुचिता सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था। प्रधानमंत्री के निर्देश पर अब उसे और सुदृढ़ करने के लिए यह संशोधन लाया गया है।

गौरतलब है कि पेपर लीक की घटनाएँ किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रही हैं — अलग-अलग राज्यों और परीक्षाओं में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। मंत्री ने कहा कि पहले इस तरह की कड़ी कार्रवाई नहीं होती थी, जो अब की जा रही है।

कांग्रेस पर निशाना और ऐतिहासिक संदर्भ

जितेंद्र सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) पर निशाना साधते हुए कहा कि 2009 के रेलवे भर्ती परीक्षा पेपर लीक से लेकर 2012 के एम्स प्रवेश परीक्षा पेपर लीक तक कई बड़े मामले कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सामने आए। उन्होंने यह भी बताया कि 1992 में कांग्रेस सरकार के दौरान एक समिति ने केंद्रीय परीक्षा समिति बनाने की सिफारिश की थी और 2010 में भी यही सुझाव दोहराया गया, लेकिन कांग्रेस व यूपीए सरकारों ने इन्हें लागू नहीं किया।

मंत्री के अनुसार, वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का गठन किया और 2024 में पहली बार इस विषय पर व्यापक कानून बनाया।

विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशें

नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिन्हें इस विधेयक में समाहित किया गया है। इसके अतिरिक्त राधाकृष्णन समिति की कुल 46 सिफारिशों में से 35 सिफारिशें सरकार पहले ही लागू कर चुकी है।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में छात्र परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं और NEET जैसी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने बड़े विवाद खड़े किए थे।

आगे क्या होगा

जितेंद्र सिंह ने बताया कि विधेयक पेश होने के साथ ही कानून मंत्रालय ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो सरकार की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस विधेयक के प्रावधानों पर किसी को आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि यह कानून लाखों छात्रों के भविष्य की सुरक्षा और परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने के लिए लाया गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल क्रियान्वयन का है — फास्ट ट्रैक कोर्टों की संख्या, जजों की उपलब्धता और जाँच एजेंसियों की क्षमता पर विधेयक चुप है। NEET-UG 2024 विवाद के बाद NTA की साख पहले से दाँव पर है; महज़ कानूनी समयसीमा तय करने से संस्थागत विफलताएँ नहीं सुधरतीं। राधाकृष्णन समिति की 11 सिफारिशें अभी भी लंबित हैं — उनमें से कौन-सी और क्यों छूटी, इसका जवाब सरकार को देना होगा। विपक्ष की आलोचना से बचने के लिए कांग्रेस-युग के मामलों का हवाला देना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, पर यह वर्तमान जवाबदेही का विकल्प नहीं।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पब्लिक एग्जामिनेशंस (संशोधन) विधेयक 2026 क्या है?
यह 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया संशोधन विधेयक है जो 2024 के पेपर लीक-विरोधी कानून को और सख्त बनाता है। इसके तहत स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के ज़रिए पाँच महीने के भीतर पेपर लीक मामलों में सज़ा सुनाई जाएगी।
पेपर लीक के दोषियों को 5 महीने में सज़ा कैसे मिलेगी?
विधेयक के अनुसार जाँच 2 महीने और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई 3 महीने में पूरी होगी — कुल मिलाकर अधिकतम 5 महीने। अपील के लिए 30 दिन की समयसीमा तय की गई है और उच्च न्यायालय में डबल बेंच से सुनवाई नहीं होगी।
स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट कब तक बनेगी?
केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, विधेयक पेश होने के साथ ही कानून मंत्रालय ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालाँकि कोर्टों की संख्या या स्थापना की अंतिम तिथि का ब्यौरा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
नंदन नीलेकणि टास्क फोर्स और राधाकृष्णन समिति की क्या भूमिका है?
नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स ने परीक्षा सुधार पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं जिन्हें इस विधेयक में शामिल किया गया है। राधाकृष्णन समिति की 46 सिफारिशों में से 35 पहले ही लागू की जा चुकी हैं।
क्या यह विधेयक पहले के पेपर लीक कानून से अलग है?
हाँ, 2024 का मूल कानून परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता के लिए बनाया गया था, लेकिन उसमें त्वरित न्याय का कोई तंत्र नहीं था। 2026 का संशोधन विधेयक स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट, समयबद्ध जाँच और अपील की सीमित प्रक्रिया जोड़कर उसे अधिक प्रभावी बनाता है।
राष्ट्र प्रेस
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