राज्यसभा में लोक परीक्षा संशोधन विधेयक 2026 पेश: सज़ा 10 साल, जुर्माना ₹50 लाख तक बढ़ा
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 30 जुलाई 2026 को राज्यसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक 2026 विचार एवं पारित कराने के लिए पेश किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संशोधन 2024 के मूल कानून को और कठोर बनाने के लिए लाया गया है, ताकि पेपर लीक जैसे अपराधों पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सके। यह विधेयक लोकसभा में लगभग दस घंटे की चर्चा के बाद पारित होकर उच्च सदन में पहुँचा है।
संशोधन विधेयक में क्या बदला
प्रस्तावित संशोधनों के तहत व्यक्तिगत दोषियों के लिए कारावास की सज़ा 3-5 वर्ष से बढ़ाकर 5-10 वर्ष और जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख तक किया गया है। परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसियों, कंपनियों, साझेदारी फर्मों, उप-ठेकेदारों और तकनीकी सहायता प्रदाताओं पर जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ तक और परीक्षा आयोजन पर प्रतिबंध 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष तक किया गया है।
संस्थाओं के निदेशकों और वरिष्ठ प्रबंधन पर पहले 3 से 10 वर्ष की कैद और ₹1 करोड़ तक जुर्माना था, जिसे अब 5 से 10 वर्ष की कैद और ₹5 करोड़ तक जुर्माने में बदला गया है। संशोधन में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था भी शामिल है — जाँच दो महीने में पूरी करनी होगी और उसके बाद तीन महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा होगा, यानी अधिकतम पाँच महीने में निर्णय सुनिश्चित करने का लक्ष्य है।
सरकार का 'जीरो टॉलरेंस' संकल्प
जितेंद्र सिंह ने कहा कि पेपर लीक की घटनाओं के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि देश के युवाओं के भविष्य से कोई खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा और इसके खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि लोक परीक्षा अधिनियम, 2024 स्वतंत्र भारत का अपनी तरह का पहला कानून था और वर्तमान संशोधन उसी आधार को और मज़बूत करता है।
गौरतलब है कि 2024 में पेपर लीक का मामला सामने आते ही उसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया था। जितेंद्र सिंह ने सदन को बताया कि दो दिन पहले इस मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया और बुधवार से मुकदमे की सुनवाई भी शुरू हो गई है।
पेपर लीक: एक पुरानी और व्यापक समस्या
मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि पेपर लीक किसी एक राज्य या दल की समस्या नहीं है। उन्होंने 2009 रेलवे भर्ती बोर्ड परीक्षा, 2011 अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा, 2012 एम्स दिल्ली प्रवेश परीक्षा, 2013 महाराष्ट्र उच्च माध्यमिक प्रमाणपत्र परीक्षा और 2010 बीएड प्रवेश परीक्षा सहित कई ऐतिहासिक मामलों का उल्लेख किया। यह ऐसे समय में आया है जब विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के मामले जनता के भरोसे को लगातार कमज़ोर करते रहे हैं।
NTA और भर्ती एजेंसियों का संदर्भ
जितेंद्र सिंह ने बताया कि देश में सरकारी भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) चार प्रमुख एजेंसियाँ काम करती हैं, जबकि उच्च शिक्षा प्रवेश के लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) परीक्षाएँ आयोजित करती है। उन्होंने कहा कि NTA गठन का सुझाव पहली बार 1992 में आया था और 2010 में UPA सरकार के दौरान एक समिति ने भी इसकी सिफारिश की थी, किंतु इसे लागू नहीं किया गया। 33 वर्षों तक अधूरा यह काम NDA सरकार ने पूरा किया।
आगे क्या होगा
विधेयक राज्यसभा में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति से कानून का रूप लेगा। फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन और नई दंड व्यवस्था के लागू होने से प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। जितेंद्र सिंह ने सभी दलों से रचनात्मक सुझाव देने की अपील की और कहा कि सरकार उन पर गंभीरता से विचार करेगी।