27 जुलाई 2026
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लोक परीक्षा संशोधन विधेयक 2026 लोकसभा में पेश, सजा 5 से 10 साल और जुर्माना ₹50 लाख तक

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लोक परीक्षा संशोधन विधेयक 2026 लोकसभा में पेश, सजा 5 से 10 साल और जुर्माना ₹50 लाख तक

सारांश

परीक्षा घोटालों पर केंद्र का कड़ा प्रहार — लोक परीक्षा संशोधन विधेयक 2026 में सजा दोगुनी, जुर्माना पाँच गुना और फास्ट-ट्रैक अदालतों से 90 दिन में फैसले का प्रावधान। NEET और SSC जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के बाद यह कानूनी ढाँचे की सबसे बड़ी मजबूती है।

मुख्य बातें

जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में लोक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया।
अनुचित साधन अपनाने पर सजा 3 साल से बढ़ाकर न्यूनतम 5 साल , अधिकतम 10 साल ; जुर्माना ₹10 लाख से ₹50 लाख तक।
संगठित परीक्षा अपराधों में जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ ; सेवा प्रदाताओं पर प्रतिबंध 4 से 8 वर्ष ।
नई धारा 12क के तहत जाँच 2 माह और सुनवाई 3 माह में पूरी करना अनिवार्य; विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें और विशेष लोक अभियोजक नियुक्त होंगे।
अपील 30 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में; निपटान यथासंभव 3 माह में।
यह अधिनियम UPSC, SSC, RRB, IBPS, NTA सहित सभी केंद्रीय परीक्षा निकायों पर लागू होगा।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया। यह विधेयक 2024 के मूल अधिनियम को और कठोर बनाने के उद्देश्य से लाया गया है, जिसमें सजा की अवधि बढ़ाने, फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने और जुर्माने की सीमा कई गुना बढ़ाने का प्रस्ताव है। हाल के वर्षों में प्रश्न-पत्र लीक और संगठित परीक्षा गड़बड़ियों की बढ़ती घटनाओं की पृष्ठभूमि में यह कदम उठाया गया है।

विधेयक में क्या बदला

अनुचित साधनों का उपयोग करने वाले परीक्षार्थियों के लिए न्यूनतम कारावास 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष करने का प्रस्ताव है। साथ ही अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख किया जाएगा।

परीक्षा संचालन से जुड़े सेवा प्रदाताओं पर अधिकतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ होगा और उन्हें सार्वजनिक परीक्षाएँ आयोजित करने से प्रतिबंधित करने की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष की जाएगी। सेवा प्रदाताओं के प्रबंधकीय कर्मियों के लिए भी न्यूनतम 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष की सजा के साथ ₹5 करोड़ तक जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है।

संगठित परीक्षा अपराधों के मामलों में न्यूनतम सजा 5 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष, अधिकतम 10 वर्ष और जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ तक करने का प्रस्ताव है।

फास्ट-ट्रैक न्याय का ढाँचा

विधेयक में नई धारा 12क जोड़ी जाएगी, जिसके तहत जाँच दो माह के भीतर पूरी करना अनिवार्य होगा। सत्र न्यायालयों को विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत के रूप में नामित किया जाएगा, जहाँ दैनिक सुनवाई होगी और आरोप पत्र दाखिल होने के तीन माह के भीतर सुनवाई पूरी करना आवश्यक होगा। प्रत्येक ऐसी अदालत के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किए जाएँगे।

नई धारा 12ख के अनुसार, फास्ट-ट्रैक अदालत के किसी भी निर्णय के विरुद्ध अपील 30 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में की जा सकेगी और यथासंभव तीन माह में उसका निपटान होगा। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार को अधिनियम के तहत अपराधों की जाँच विशेष कार्य बल (STF) को सौंपने का अधिकार भी दिया जाएगा।

मूल अधिनियम की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 को 12 फरवरी 2024 को अधिनियमित और 21 जून 2024 से प्रभावी किया गया था। यह अधिनियम संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) समेत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सभी परीक्षा प्राधिकरणों पर लागू होता है।

इस अधिनियम के तहत सभी अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-मुआवजा योग्य हैं, जिनमें कारावास, जुर्माना और संपत्ति जब्त करने के प्रावधान हैं। यह ऐसे समय में आया है जब NEET-UG और अन्य केंद्रीय परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर देशभर में आक्रोश रहा है।

किसे होगा फायदा

प्रस्तावित संशोधन प्रश्न-पत्र लीक, किसी अन्य व्यक्ति की जगह परीक्षा देने और संगठित नकल जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए बनाए गए हैं। सरकार का तर्क है कि कड़े दंड और त्वरित न्याय से योग्य और मेधावी उम्मीदवारों के हितों की रक्षा होगी और लोक परीक्षा प्रणाली में जनता का भरोसा बहाल होगा।

यह विधेयक आगे संसदीय प्रक्रिया से गुजरेगा और इसके पारित होने के बाद देश की परीक्षा व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत होने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल क्रियान्वयन का है — 2024 के मूल अधिनियम के बाद भी बड़े परीक्षा घोटाले सामने आते रहे, जो बताता है कि कानून की कमी नहीं, प्रवर्तन की कमज़ोरी समस्या है। फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रावधान स्वागतयोग्य है, परंतु देश में पहले से लंबित मामलों के बोझ तले दबी न्यायपालिका के लिए 90 दिन की समयसीमा कितनी व्यावहारिक होगी, यह देखना होगा। सेवा प्रदाताओं पर ₹10 करोड़ तक के जुर्माने से निजी एजेंसियों पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन NTA जैसी सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही का सवाल इस विधेयक में अनुत्तरित रह जाता है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोक परीक्षा संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
यह 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया वह विधेयक है जो 2024 के लोक परीक्षा अधिनियम को और कठोर बनाता है। इसमें सजा बढ़ाने, फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने और जुर्माने की सीमा कई गुना बढ़ाने का प्रस्ताव है।
इस विधेयक में परीक्षा में नकल करने पर कितनी सजा का प्रावधान है?
अनुचित साधन अपनाने वाले परीक्षार्थियों के लिए न्यूनतम सजा 3 साल से बढ़ाकर 5 साल और अधिकतम 10 साल करने का प्रस्ताव है। अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख किया जाएगा।
फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रावधान कैसे काम करेगा?
नई धारा 12क के तहत जाँच 2 माह में पूरी होगी और आरोप पत्र दाखिल होने के 3 माह के भीतर सुनवाई समाप्त होनी चाहिए। विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों में दैनिक सुनवाई और विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का भी प्रावधान है।
यह विधेयक किन परीक्षाओं पर लागू होगा?
यह UPSC, SSC, RRB, IBPS और NTA सहित केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सभी परीक्षा प्राधिकरणों की परीक्षाओं पर लागू होगा। इसके तहत सभी अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-मुआवजा योग्य हैं।
सेवा प्रदाताओं पर इस विधेयक का क्या असर पड़ेगा?
परीक्षा संचालन में शामिल सेवा प्रदाताओं पर अधिकतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ होगा और उन्हें परीक्षा आयोजन से प्रतिबंधित करने की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष की जाएगी। संगठित अपराधों में जुर्माना ₹10 करोड़ तक हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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