असम बेदखली विवाद: वन मंत्री जयंता मल्लबरुआ ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देकर लुटुमारी अभियान का बचाव किया
सारांश
मुख्य बातें
असम के वन मंत्री जयंता मल्लबरुआ ने 26 अक्टूबर 2026 को नागांव जिले के लुटुमारी आरक्षित वन में चलाए गए बेदखली अभियान का पुरज़ोर बचाव करते हुए कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और स्थापित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप थी। बांग्लादेश द्वारा इस अभियान को एक धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाली कार्रवाई के रूप में चित्रित किए जाने के बाद मंत्री ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया।
अभियान का ब्यौरा
17 और 18 अक्टूबर 2026 को चलाए गए इस बेदखली अभियान में 314 हेक्टेयर अधिसूचित वन भूमि को पुनः प्राप्त किया गया और 563 परिवार विस्थापित हुए। मल्लबरुआ ने स्पष्ट किया कि यह अभियान बरसात के मौसम के बाहर चलाया गया और शांतिपूर्वक संपन्न हुआ — किसी प्रतिरोध या बल प्रयोग की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को अभियान शुरू होने से पहले अपना सामान हटाने और घर खाली करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने का दावा किया।
न्यायिक आधार
मंत्री ने 10 फरवरी 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश का उल्लेख किया जिसमें असम के अधिसूचित वन क्षेत्रों से बेदखली की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (सिविल) का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय ने 2 सितंबर 2026 को कर दिया था। मल्लबरुआ ने तर्क दिया कि अदालती कार्यवाही यह स्थापित करती है कि बेदखली की यह प्रक्रिया विधि-सम्मत थी।
पर्यावरणीय तर्क
मंत्री ने अभियान के पीछे पारिस्थितिक कारणों को प्रमुखता से रखा। उनके अनुसार पुनः प्राप्त भूमि पर स्थानीय वृक्ष प्रजातियों का वृक्षारोपण किया जाएगा ताकि हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों के आवासों को पुनर्जीवित किया जा सके और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में मदद मिल सके। उन्होंने रेखांकित किया कि आरक्षित वनों की रक्षा करना वैधानिक दायित्व और पारिस्थितिक आवश्यकता दोनों है, और मानवीय चिंताएं कानून के शासन से ऊपर नहीं हो सकतीं।
बांग्लादेश की आपत्ति और असम का जवाब
बांग्लादेश ने इस बेदखली अभियान और घरों को गिराए जाने पर चिंता जताते हुए इसे एक धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाली कार्रवाई बताया था। असम सरकार ने इस चित्रण को भ्रामक करार दिया। मल्लबरुआ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि अभियान का उद्देश्य अधिसूचित वन भूमि को पुनः प्राप्त करना और पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करना था, न कि किसी धार्मिक या सामाजिक समुदाय को निशाना बनाना। उन्होंने ज़ोर दिया कि सरकार सभी समुदायों का सम्मान करती है और परिवारों को हुई कठिनाइयों को समझती है।
आगे की राह
मंत्री ने आग्रह किया कि इस अभियान का मूल्यांकन कानूनी रिकॉर्ड, अदालती कार्यवाही और घोषित पर्यावरणीय उद्देश्यों के आधार पर किया जाए। गौरतलब है कि असम में वन भूमि पर बेदखली अभियान पहले भी विवाद का विषय रहे हैं और इस बार इसमें द्विपक्षीय आयाम जुड़ने से मामला राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ध्यान खींच रहा है। विस्थापित परिवारों के पुनर्वास को लेकर अभी स्पष्ट सरकारी योजना सामने नहीं आई है, जो आने वाले समय में एक अहम प्रश्न बना रहेगा।