31 अगस्त 2026
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बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी: 2016 से अब तक 9,130 दर्ज मामले, अंतरराष्ट्रीय दिवस पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की माँग

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बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी: 2016 से अब तक 9,130 दर्ज मामले, अंतरराष्ट्रीय दिवस पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की माँग

सारांश

बलूचिस्तान के मानवाधिकार संगठनों ने 30 अगस्त को जबरन गुमशुदगी के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर 2016 से अब तक के 9,130 दर्ज मामलों का हवाला देते हुए संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय से पाकिस्तान पर दबाव बनाने की अपील की — और कहा कि बलूचों के लिए यह दर्द साल में एक दिन का नहीं, रोज़ की सच्चाई है।

मुख्य बातें

30 अगस्त 2026 को जबरन गायब किए गए पीड़ितों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर बलूचिस्तान के प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई की माँग की।
बलूचिस्तान मानवाधिकार परिषद (एचआरसीबी) के अनुसार जनवरी 2016 से जुलाई 2026 के बीच जबरन गुमशुदगी के 9,130 दर्ज मामले हैं, जो वास्तविक संख्या का एक अंश मात्र बताए जाते हैं।
बीएसओ-आज़ाद ने कहा कि 2026 की पहली छमाही में ही 800 से अधिक बलूच नागरिक जबरन गायब किए गए, जिनमें मस्तुंग का डेढ़ वर्षीय जाकिर भी शामिल है।
बीवाईसी नेता सबीहा बलूच ने एक्स पर कहा कि बलूच परिवारों के लिए जबरन गुमशुदगी रोज़ की सच्चाई है, साल में एक बार का मुद्दा नहीं।
बलोच वॉयस फॉर जस्टिस (बीवीजे) ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तानी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की अपील की।

बलूचिस्तान के प्रमुख मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं ने 30 अगस्त 2026 को जबरन गायब किए गए पीड़ितों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर उन हजारों बलूचों को श्रद्धांजलि दी, जिन्हें कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने उनके घरों, सड़कों और समुदायों से उठाकर गायब कर दिया। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय से तत्काल और प्रभावी हस्तक्षेप की अपील की गई।

मुख्य घटनाक्रम

बलूचिस्तान मानवाधिकार परिषद (एचआरसीबी) ने इस अवसर पर खुलासा किया कि जनवरी 2016 से जुलाई 2026 के बीच उसके पास पूरे बलूचिस्तान से जबरन गुमशुदगी के 9,130 दर्ज मामले हैं। संगठन ने स्पष्ट किया कि यह वास्तविक संख्या का केवल एक अंश है, क्योंकि अनेक क्षेत्र सुरक्षा बलों के कड़े नियंत्रण में हैं, जिससे बड़ी संख्या में मामलों का दस्तावेजीकरण संभव नहीं हो पाता।

एचआरसीबी ने कहा, 'हर संख्या के पीछे एक माँ अपने बेटे का इंतजार कर रही है, एक बच्चा अपने माता-पिता का इंतजार कर रहा है, एक पत्नी अपने पति का इंतजार कर रही है, और एक परिवार हर दिन अनिश्चितता के साथ जी रहा है।'

बीएसओ-आज़ाद के आरोप

बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (बीएसओ)-आज़ाद ने पाकिस्तानी बलों पर बलूचिस्तान की जनता के विरुद्ध 'गैर-कानूनी कार्रवाई' करने का आरोप लगाया और कहा कि जबरन गायब करना इन कथित अत्याचारों का सबसे प्रमुख स्वरूप बन चुका है। संगठन ने एक्स पोस्ट में कहा कि 2026 की पहली छमाही में ही 800 से अधिक बलूच छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता, शिक्षक, डॉक्टर, मजदूर, दुकानदार और अन्य नागरिक जबरन गायब किए जाने का शिकार हुए हैं।

बीएसओ के अनुसार, पीड़ितों में महिलाएँ, लड़कियाँ, नाबालिग बच्चे, बुजुर्ग और युवा शामिल हैं — उम्र का दायरा आठ वर्ष से साठ वर्ष तक है। इनमें मस्तुंग के डेढ़ वर्षीय जाकिर का मामला भी शामिल है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करता है।

बलूच यकजेहती कमेटी की आवाज़

बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता सबीहा बलूच ने एक्स पर लिखा कि बलूच लोगों के लिए जबरन गुमशुदगी साल में एक बार याद करने का मुद्दा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कड़वी सच्चाई है। उन्होंने कहा, 'बलोच परिवार हर दिन इस डर के साथ जीते हैं कि कहीं उनका कोई और अपना उठा न लिया जाए। माताएँ अपने बेटों का और बच्चे अपने पिता का इंतजार करते हैं। दुनिया को चुप नहीं रहना चाहिए, जबकि परिवार उम्मीद और असहनीय दर्द के बीच इंतजार कर रहे हैं।'

अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील

बलोच वॉयस फॉर जस्टिस (बीवीजे) ने वैश्विक समुदाय से आग्रह किया कि वह मानवाधिकारों की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी निभाए, पाकिस्तानी अधिकारियों से जवाबदेही की माँग करे और बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी की प्रथा को समाप्त करने के प्रयासों का समर्थन करे। गौरतलब है कि जबरन गायब किए गए पीड़ितों का अंतरराष्ट्रीय दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2011 में स्थापित किया गया था, ताकि इस गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जा सके।

यह ऐसे समय में आया है जब बलूचिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ रहा है। इन संगठनों की माँग है कि संयुक्त राष्ट्र, बच्चों, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों सहित जबरन गायब किए गए हजारों बलूचों की रिहाई के लिए ठोस और सार्थक कदम उठाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

130 मामले केवल एक आँकड़ा नहीं — यह उस व्यापक दस्तावेजीकरण संकट का प्रमाण है जो तब उत्पन्न होता है जब पीड़ित क्षेत्र तक पहुँच ही बाधित हो। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि डेढ़ साल के बच्चे से लेकर साठ वर्षीय बुजुर्ग तक का गायब होना इसे किसी 'सुरक्षा अभियान' की श्रेणी में नहीं रखता — यह व्यवस्थागत दमन की ओर संकेत करता है। संयुक्त राष्ट्र की निंदाएँ वर्षों से आती रही हैं, लेकिन जवाबदेही का तंत्र अब तक अनुपस्थित है — यही वह खाई है जिसे ये संगठन भरना चाहते हैं।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जबरन गायब किए गए पीड़ितों का अंतरराष्ट्रीय दिवस क्या है?
यह प्रतिवर्ष 30 अगस्त को मनाया जाने वाला संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित दिवस है, जिसे 2011 में जबरन गुमशुदगी के मानवाधिकार उल्लंघन के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और पीड़ितों व उनके परिवारों के सम्मान में स्थापित किया गया था।
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी के कितने मामले दर्ज हैं?
बलूचिस्तान मानवाधिकार परिषद (एचआरसीबी) के अनुसार जनवरी 2016 से जुलाई 2026 के बीच 9,130 मामले दर्ज किए गए हैं। संगठन का कहना है कि यह वास्तविक संख्या का एक छोटा हिस्सा है, क्योंकि कई क्षेत्र सुरक्षा बलों के नियंत्रण में होने के कारण दस्तावेजीकरण संभव नहीं हो पाता।
बीएसओ-आज़ाद ने 2026 में जबरन गुमशुदगी को लेकर क्या दावे किए हैं?
बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (बीएसओ)-आज़ाद ने कहा कि 2026 की पहली छमाही में 800 से अधिक बलूच नागरिक — जिनमें छात्र, शिक्षक, डॉक्टर, मजदूर और नाबालिग बच्चे शामिल हैं — जबरन गायब किए गए। इनमें मस्तुंग के डेढ़ वर्षीय जाकिर का मामला भी शामिल है।
सबीहा बलूच ने इस दिन क्या कहा?
बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता सबीहा बलूच ने एक्स पर कहा कि बलूच परिवारों के लिए जबरन गुमशुदगी साल में एक बार याद करने का मुद्दा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से चुप न रहने की अपील की।
इन संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्या माँग की है?
बलोच वॉयस फॉर जस्टिस (बीवीजे) सहित विभिन्न संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय से आग्रह किया कि वे पाकिस्तानी अधिकारियों से जवाबदेही की माँग करें, जबरन गायब किए गए बलूचों — जिनमें बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग शामिल हैं — की रिहाई सुनिश्चित करें और इस प्रथा को समाप्त करने के प्रयासों का समर्थन करें।
राष्ट्र प्रेस
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