3 नवंबर 2026
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बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व शाखा प्रबंधक को रिश्वत मामले में 4 साल की जेल, ₹30,000 जुर्माना

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बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व शाखा प्रबंधक को रिश्वत मामले में 4 साल की जेल, ₹30,000 जुर्माना

सारांश

लखनऊ की CBI विशेष अदालत ने बलरामपुर में तैनात बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व प्रबंधक सुबोध कुमार रस्तोगी को ₹5 लाख के ऋण मामले में रिश्वत लेने के आरोप में 4 साल की जेल और ₹30,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई — एक दशक पुराने मामले में यह फ़ैसला बैंकिंग भ्रष्टाचार पर CBI की सख्ती का संकेत है।

मुख्य बातें

CBI की विशेष अदालत, लखनऊ ने 2 नवंबर 2026 को फ़ैसला सुनाया।
बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व शाखा प्रबंधक सुबोध कुमार रस्तोगी को 4 साल की जेल और ₹30,000 जुर्माना ।
रस्तोगी बलरामपुर, उत्तर प्रदेश शाखा में तैनात थे; मामला 26 अक्टूबर 2015 की शिकायत पर आधारित।
आरोप: ₹5 लाख के ऋण पर ₹25,000 + ₹25,000 रिश्वत माँगी; CBI ने ₹10,000 लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया।
CBI ने 18 दिसंबर 2015 को आरोप पत्र दाखिल किया था; एक दशक बाद अदालत ने दोषसिद्धि सुनाई।

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत ने 2 नवंबर 2026 को बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व शाखा प्रबंधक सुबोध कुमार रस्तोगी को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कारावास और ₹30,000 के जुर्माने की सज़ा सुनाई। घटना के समय रस्तोगी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा शाखा में प्रबंधक के पद पर तैनात थे।

मामले का मूल घटनाक्रम

इस प्रकरण की जड़ें 26 अक्टूबर 2015 को दर्ज एक शिकायत में हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसने अपने सोलर लाइट कारोबार के विस्तार के लिए बैंक से ₹5 लाख का ऋण लिया था। जब ₹1.25 लाख की टर्म लोन राशि जारी की जाने लगी, तब शाखा प्रबंधक ने सीए शुल्क, स्टांप पेपर और फ़ाइल शुल्क के नाम पर कथित तौर पर ₹25,000 वसूल लिए।

इसके बाद जब ₹3.75 लाख की कैश क्रेडिट लिमिट जारी करने की बारी आई, तो आरोप है कि रस्तोगी ने खाता बंद करने की धमकी देकर ₹25,000 की अतिरिक्त रिश्वत माँगी। CBI ने मामले में जाल बिछाया और आरोपी को शिकायतकर्ता से ₹10,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

आरोप पत्र से निर्णय तक की यात्रा

गिरफ्तारी के बाद जाँच पूरी होने पर CBI ने 18 दिसंबर 2015 को आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। लखनऊ स्थित CBI की विशेष अदालत में वर्षों की सुनवाई के बाद अंततः अदालत ने सुबोध कुमार रस्तोगी को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दोषी मानते हुए सज़ा सुनाई। यह ऐसे समय में आया है जब भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि दर पर सार्वजनिक बहस तेज़ है।

CBI की भूमिका और रुख

CBI ने फ़ैसले के बाद कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों के विरुद्ध एजेंसी की कार्रवाई निरंतर जारी है और दोषियों को कानून के दायरे में लाने के लिए सख्त कदम उठाए जाते रहेंगे। गौरतलब है कि बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में CBI की विशेष अदालतों द्वारा दोषसिद्धि को एक महत्त्वपूर्ण निवारक कदम माना जाता है।

आम जनता और बैंकिंग क्षेत्र पर असर

यह मामला उन छोटे व्यापारियों और उद्यमियों की समस्याओं को उजागर करता है जो बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए अधिकारियों पर निर्भर रहते हैं। सोलर लाइट जैसे लघु उद्योगों के लिए ऋण लेने की प्रक्रिया में इस प्रकार की रिश्वतखोरी न केवल आर्थिक नुकसान पहुँचाती है, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली में भरोसे को भी कमज़ोर करती है।

आगे क्या होगा

अदालत के इस फ़ैसले के बाद अब देखना यह होगा कि क्या रस्तोगी उच्च न्यायालय में अपील करते हैं। CBI के अनुसार, एजेंसी बैंकिंग और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के लंबित मामलों को तेज़ी से निपटाने के लिए प्रतिबद्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व प्रबंधक सुबोध कुमार रस्तोगी को किस मामले में सज़ा हुई?
सुबोध कुमार रस्तोगी को बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में तैनाती के दौरान एक सोलर लाइट व्यापारी को ₹5 लाख का ऋण देने के एवज़ में रिश्वत लेने के मामले में दोषी ठहराया गया। CBI ने उन्हें रंगे हाथों गिरफ्तार किया था और लखनऊ की विशेष अदालत ने 4 साल की जेल व ₹30,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई।
यह मामला कब और कैसे सामने आया?
मामले की शुरुआत 26 अक्टूबर 2015 को दर्ज शिकायत से हुई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि रस्तोगी ने टर्म लोन और कैश क्रेडिट लिमिट जारी करने के बदले में रिश्वत माँगी। CBI ने जाल बिछाकर आरोपी को ₹10,000 लेते हुए गिरफ्तार किया।
CBI ने इस मामले में आरोप पत्र कब दाखिल किया?
CBI ने जाँच पूरी करने के बाद 18 दिसंबर 2015 को लखनऊ की विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद दशक भर की सुनवाई के बाद 2 नवंबर 2026 को अदालत ने फ़ैसला सुनाया।
क्या आरोपी ने रिश्वत की पूरी राशि एक बार में माँगी थी?
नहीं, आरोपों के अनुसार रिश्वत दो चरणों में माँगी गई। पहले ₹1.25 लाख की टर्म लोन जारी करते समय सीए शुल्क और फ़ाइल शुल्क के नाम पर ₹25,000 वसूले गए। बाद में ₹3.75 लाख की कैश क्रेडिट लिमिट के लिए खाता बंद करने की धमकी देकर ₹25,000 की रिश्वत माँगी गई।
इस फ़ैसले का बैंकिंग भ्रष्टाचार पर क्या असर पड़ेगा?
CBI के अनुसार, यह दोषसिद्धि बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एजेंसी की निरंतर कार्रवाई का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक बैंकों में ऐसे मामलों में सख्त सज़ा छोटे उद्यमियों को ऋण प्रक्रिया में उत्पीड़न से सुरक्षा देने में निवारक भूमिका निभा सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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