उज्जैन: भाद्रपद त्रयोदशी पर महाकाल का राजाधिराज शृंगार, चंद्रमा-त्रिपुंड-त्रिशूल से सुसज्जित हुए बाबा
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक अनुष्ठान के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे।
द्वार उद्घाटन और अभिषेक
तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों के उद्घोष के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। मंत्रोच्चार के मध्य भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजा के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया और कपूर आरती के उपरांत बाबा ने मुकुट धारण किया।
भस्म आरती और राजाधिराज शृंगार
झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की गूँज के बीच महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से परंपरा के अनुसार बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की गई। इस अवसर पर बाबा का मूंछों वाले राजाधिराज के रूप में विशेष शृंगार किया गया — माथे पर चंद्रमा, त्रिपुंड और त्रिशूल अंकित किए गए तथा पीले चंदन से सूर्य के समान तेज उकेरा गया।
मान्यता और परंपरा
प्रचलित मान्यता के अनुसार भस्म अर्पित किए जाने के उपरांत बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों हेतु पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं हेतु साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह अनुष्ठान सदियों से उज्जैन की आध्यात्मिक पहचान का केंद्र रहा है।
श्रद्धालुओं का जनसैलाब
दर्शन के उपरांत जैसे ही भक्तों को बाबा के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गूँज उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की त्रिवेणी ने वातावरण को आस्था और भक्ति से सराबोर कर दिया। मंदिर के पुजारियों ने महाआरती विधिवत संपन्न कराई।
गौरतलब है कि श्री महाकालेश्वर देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं और यहाँ की भस्म आरती देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। आगामी पर्वों पर भी इसी तरह के विशेष शृंगार और आरती की परंपरा जारी रहेगी।