भोजशाला विवाद: मुस्लिम पक्ष ने MP हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

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भोजशाला विवाद: मुस्लिम पक्ष ने MP हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

सारांश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को हिंदू मंदिर माना, 2003 की एएसआई नमाज व्यवस्था खारिज की — अब मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। हिंदू पक्ष ने भी कैविएट दाखिल कर बिना सुनवाई अंतरिम राहत रोकने की मांग की। यह दशकों पुराना विवाद देश की सर्वोच्च अदालत में नए मोड़ पर है।

मुख्य बातें

काजी मोइनुद्दीन ने MP हाई कोर्ट के 15 मई 2026 के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल की; डायरी नंबर 32281/2026 दर्ज।
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने भोजशाला को राजा भोज की संपत्ति और हिंदू मंदिर माना था।
7 अप्रैल 2003 की एएसआई की नमाज-व्यवस्था को कोर्ट ने स्थल के मूल स्वरूप के विरुद्ध बताया।
16 मई 2026 को एएसआई ने नया आदेश जारी कर हिंदू समुदाय को परिसर में बिना रोक-टोक प्रवेश की अनुमति दी।
हिंदू पक्ष की ओर से जितेंद्र सिंह विशेन ने कैविएट याचिका दायर की — बिना सुनवाई अंतरिम आदेश न हो।
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन से मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा वापस लाने का प्रयास करने का निर्देश दिया।

मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को हिंदू मंदिर घोषित करने और हिंदू समुदाय को विशेष पूजा अधिकार देने वाले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले के विरुद्ध मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। काजी मोइनुद्दीन की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर डायरी नंबर 32281/2026 के रूप में दर्ज है और फिलहाल लंबित बताई गई है।

हाई कोर्ट का फैसला: मुख्य बिंदु

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने 15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने भोजशाला परिसर को राजा भोज की संपत्ति और हिंदू मंदिर माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू समुदाय का पूजा का अधिकार कभी समाप्त नहीं हुआ।

खंडपीठ ने 7 अप्रैल 2003 की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की उस व्यवस्था को भी स्थल के मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं माना, जिसके तहत परिसर में नमाज की अनुमति दी गई थी। साथ ही कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक भूमि पर मस्जिद निर्माण हेतु विचार करने का निर्देश भी दिया।

पुरातात्विक साक्ष्य और एएसआई का नया आदेश

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में 2024 के पुरातात्विक सर्वेक्षण का संदर्भ दिया, जिसमें संस्कृत शिलालेख, हवन कुंड और हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़े अनेक प्रमाण मिलने की बात कही गई थी। इन साक्ष्यों को फैसले का आधार माना गया।

फैसले के अगले ही दिन 16 मई 2026 को एएसआई ने नया आदेश जारी कर हिंदू समुदाय को भोजशाला परिसर में पूजा और मां सरस्वती से जुड़े अध्ययन कार्यों के लिए बिना रोक-टोक प्रवेश की अनुमति दे दी। हालांकि, संरक्षित स्मारक होने के कारण प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही बना रहेगा।

ब्रिटिश म्यूजियम से प्रतिमा वापसी का निर्देश

हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह प्रयास करने का भी निर्देश दिया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाया जाए। यह निर्देश इस विवाद के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आयाम को और गहरा करता है।

हिंदू पक्ष की कैविएट याचिका

इस बीच, हिंदू पक्ष ने भी सर्वोच्च न्यायालय में कैविएट याचिका दाखिल की है। जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से दायर इस याचिका में अनुरोध किया गया है कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ किसी भी याचिका पर उनका पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न किया जाए।

विवाद की पृष्ठभूमि

भोजशाला विवाद मध्य भारत के सर्वाधिक संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में से एक रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा मां सरस्वती के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था। मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि यहां सदियों से कमाल मौला मस्जिद मौजूद है और पूर्व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए इस स्थल की कानूनी स्थिति पहले ही तय की जा चुकी है।

अब जबकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है, देश की सर्वोच्च अदालत का रुख इस बहु-दशकीय विवाद की दिशा तय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

सदियों की धार्मिक प्रथाओं पर भारी पड़ सकते हैं — एक प्रश्न जिसका उत्तर केवल भोजशाला नहीं, बल्कि ऐसे अन्य विवादित स्थलों की दिशा भी तय करेगा।
RashtraPress
22 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला विवाद में सुप्रीम कोर्ट में क्या याचिका दाखिल हुई है?
काजी मोइनुद्दीन की ओर से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 15 मई 2026 के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई है। यह याचिका डायरी नंबर 32281/2026 के रूप में दर्ज है और फिलहाल लंबित है।
MP हाई कोर्ट ने भोजशाला पर क्या फैसला दिया था?
इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी ने 15 मई 2026 को भोजशाला परिसर को राजा भोज की संपत्ति और हिंदू मंदिर माना। कोर्ट ने कहा कि हिंदू समुदाय का पूजा अधिकार कभी समाप्त नहीं हुआ और 2003 की एएसआई नमाज व्यवस्था स्थल के मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं थी।
एएसआई ने हाई कोर्ट के फैसले के बाद क्या कदम उठाया?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 16 मई 2026 को नया आदेश जारी कर हिंदू समुदाय को भोजशाला परिसर में पूजा और मां सरस्वती से जुड़े अध्ययन कार्यों के लिए बिना रोक-टोक प्रवेश की अनुमति दी। संरक्षित स्मारक होने के कारण प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही रहेगा।
हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कदम उठाया है?
हिंदू पक्ष की ओर से जितेंद्र सिंह विशेन ने सर्वोच्च न्यायालय में कैविएट याचिका दाखिल की है। इसमें अनुरोध किया गया है कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ किसी भी याचिका पर उनका पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न किया जाए।
भोजशाला विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा मां सरस्वती के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां सदियों से कमाल मौला मस्जिद मौजूद है और पूर्व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए इस स्थल की कानूनी स्थिति पहले ही तय की जा चुकी है।
राष्ट्र प्रेस
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