भोजशाला मंदिर घोषित: अशोक जैन बोले, साढ़े छह साल के संघर्ष और बलिदान का मिला फल

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भोजशाला मंदिर घोषित: अशोक जैन बोले, साढ़े छह साल के संघर्ष और बलिदान का मिला फल

सारांश

साढ़े छह साल के आंदोलन, सत्याग्रह और कानूनी लड़ाई के बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार की भोजशाला को मंदिर घोषित किया। भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन ने इसे ऐतिहासिक बताया — अब भक्त बिना किसी बाधा के 24 घंटे पूजा कर सकते हैं।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार जिले की भोजशाला को आधिकारिक रूप से मंदिर घोषित किया।
भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन ने कहा कि यह लड़ाई लगभग साढ़े छह साल तक चली।
2003 के आसपास पहली बार भोजशाला में पूजा-अर्चना की अनुमति मिली थी।
हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक तथ्यों और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर यह निर्णय सुनाया।
फैसले के बाद भक्तों को 24 घंटे बिना किसी शुल्क या बाधा के दर्शन की सुविधा मिली।
समिति के सदस्यों ने परिसर में हनुमान चालीसा पाठ और विशेष पूजा-अर्चना की।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार जिले की भोजशाला को आधिकारिक रूप से मंदिर घोषित किए जाने के बाद 16 मई 2026 को पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह की लहर दौड़ गई। भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन ने इस फैसले को ऐतिहासिक करार देते हुए कहा कि यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत, समर्पण और अनेक लोगों के बलिदान का परिणाम है।

साढ़े छह साल की कानूनी और सामाजिक लड़ाई

अशोक जैन के अनुसार भोजशाला को मंदिर के रूप में मान्यता दिलाने की यह लड़ाई लगभग साढ़े छह साल तक चली। इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आए और समिति तथा हिंदू समाज के कार्यकर्ताओं ने लगातार आंदोलन जारी रखा। उन्होंने बताया कि समय-समय पर सत्याग्रह भी किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

पूजा पर पाबंदियों से लेकर 24 घंटे दर्शन तक का सफर

जैन ने बताया कि शुरुआती दौर में भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना को लेकर कई तरह की पाबंदियाँ थीं। उनके अनुसार 2003 के आसपास पहली बार यहाँ पूजा की अनुमति मिली और तब से यह परंपरा धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही। कई बार प्रशासनिक बाधाएँ भी सामने आईं, लेकिन भक्तों का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि अब कोर्ट के फैसले के बाद भक्तों को यहाँ 24 घंटे पूजा करने जैसी स्थिति उपलब्ध हो गई है।

हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक तथ्यों और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर दिया निर्णय

जैन के अनुसार वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के अंत में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों और सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाकर यह निर्णय दिया। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि भोजशाला ऐतिहासिक रूप से एक मंदिर और शिक्षा का केंद्र रही है। गौरतलब है कि यह स्थल राजा भोज से जुड़ी विरासत के रूप में सदियों से पहचाना जाता रहा है।

समिति और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया

भोज उत्सव समिति के जनरल मैनेजर हेमंत डौराया ने कहा कि यह दिन उनके लिए अत्यंत हर्ष का है। उन्होंने बताया कि पहले दर्शन के लिए कुछ सीमाएँ और शुल्क जैसी व्यवस्थाएँ थीं, किंतु अब कोर्ट के आदेश के बाद भक्त बिना किसी परेशानी के मंदिर में पूजा-अर्चना कर पा रहे हैं। उनके अनुसार जिस तरह बसंत पंचमी पर लाखों श्रद्धालु यहाँ आते थे, उसी तरह अब रोज़ाना बड़ी संख्या में भक्तों के आने की उम्मीद है।

परिसर में भक्ति का माहौल

फैसले के बाद भोजशाला परिसर में धार्मिक गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं। समिति के सदस्यों ने परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ किया और फूल-मालाओं के साथ विशेष पूजा-अर्चना की। भक्तों का कहना है कि अब उन्हें यहाँ बिना किसी बाधा के दर्शन करने का सौभाग्य मिल रहा है। आने वाले दिनों में प्रशासन और समिति मिलकर यहाँ व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ करने की दिशा में काम करेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ कानूनी और सामाजिक आंदोलन एक साथ चले। गौरतलब है कि 2003 से पूजा की सीमित अनुमति के बावजूद दशकों तक प्रशासनिक पाबंदियाँ बनी रहीं, जो यह सवाल उठाती हैं कि ऐसे संवेदनशील स्थलों पर नीति-निर्माण कितना सुसंगत और पारदर्शी रहा है। अब जबकि कोर्ट ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया है, असली परीक्षा प्रशासन की उस क्षमता की होगी जो धार्मिक उत्साह और सामाजिक सौहार्द दोनों को एक साथ संभाल सके।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला को मंदिर कब और किसने घोषित किया?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार जिले की भोजशाला को मंदिर घोषित किया। यह फैसला ऐतिहासिक तथ्यों और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर दिया गया, जिसके बाद 16 मई 2026 को पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह देखा गया।
भोजशाला विवाद की लड़ाई कितने समय तक चली?
भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन के अनुसार यह कानूनी और सामाजिक लड़ाई लगभग साढ़े छह साल तक चली। इस दौरान कई सत्याग्रह हुए और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने आंदोलन में भाग लिया।
भोजशाला में पूजा की अनुमति पहले से थी या नहीं?
2003 के आसपास पहली बार भोजशाला में पूजा-अर्चना की सीमित अनुमति मिली थी। इससे पहले कई तरह की पाबंदियाँ और प्रशासनिक बाधाएँ थीं; अब कोर्ट के फैसले के बाद भक्त बिना किसी शुल्क या बाधा के 24 घंटे दर्शन कर सकते हैं।
हाई कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर क्यों माना?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों और सर्वे रिपोर्ट की समीक्षा के बाद यह निर्णय दिया। फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि यह स्थल ऐतिहासिक रूप से एक मंदिर और शिक्षा का केंद्र रहा है।
फैसले के बाद भोजशाला में क्या बदला?
फैसले के बाद परिसर में धार्मिक गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं। दर्शन के लिए पहले जो शुल्क और सीमाएँ थीं, वे समाप्त हो गई हैं। भोज उत्सव समिति के सदस्यों ने हनुमान चालीसा पाठ और विशेष पूजा-अर्चना की, और बसंत पंचमी जैसी भीड़ रोज़ाना आने की उम्मीद जताई गई है।
राष्ट्र प्रेस
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