बिहार के ऐतिहासिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वे: केसरिया स्तूप, बोधगया और मुंडेश्वरी मंदिर को मिलेगी वैश्विक पहचान
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 5 अगस्त 2025 को देश के वरिष्ठ पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों के साथ बैठक कर राज्य के प्रमुख ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थलों — बोधगया, केसरिया स्तूप, सुल्तानगंज, मंदार और कैमूर स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर — के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन, संरक्षण और समग्र विकास हेतु विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया। बिहार सरकार का यह कदम राज्य की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
मुख्य घटनाक्रम
बैठक में पद्मश्री डॉ. केके मोहम्मद, प्रो. रजत सान्याल, प्रो. अनिल कुमार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारी सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कैमूर जिले के मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर और उसके आसपास बिखरे प्राचीन भग्नावशेषों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण, प्रलेखन और पुनर्स्थापन कर पूरे क्षेत्र को भारतीय पुरातात्विक विरासत के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
बैठक में तिलहाड़ कुंड, करकटगढ़ और कैमूर क्षेत्र के अन्य प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को एकीकृत रूप से विकसित करने की योजना पर भी विचार-विमर्श हुआ।
अत्याधुनिक तकनीक से होगा सर्वे
मुख्यमंत्री चौधरी ने बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर और उसके आसपास लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (LiDAR) तथा ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक के माध्यम से सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया। इन अत्याधुनिक तकनीकों की सहायता से बिना किसी खुदाई के जमीन के भीतर मौजूद संभावित पुरातात्विक संरचनाओं और अवशेषों की पहचान की जा सकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार इससे भविष्य में उत्खनन कार्य अधिक सटीक और प्रभावी होगा।
गौरतलब है कि LiDAR और GPR तकनीक का उपयोग पहले कंबोडिया के अंकोर वाट और मेक्सिको के माया स्थलों पर भी सफलतापूर्वक किया जा चुका है, जहाँ इसने भूमिगत संरचनाओं की पहचान में क्रांतिकारी परिणाम दिए थे।
केसरिया स्तूप का शेष उत्खनन
बैठक में विश्व के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में शामिल केसरिया स्तूप के शेष हिस्से के वैज्ञानिक उत्खनन का निर्णय भी लिया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब तक स्तूप का केवल आंशिक उत्खनन हुआ है, जबकि इसके बड़े हिस्से में अभी भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष होने की प्रबल संभावना है। उन्होंने शेष क्षेत्र के वैज्ञानिक उत्खनन और संरक्षण की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया।
यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की संभावना
विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक संरक्षण और सुनियोजित विकास के बाद इन स्थलों को भविष्य में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब बिहार पहले से ही महाबोधि मंदिर, बोधगया (यूनेस्को विश्व धरोहर, 2002) जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विरासत का घर है। नए स्थलों की मान्यता राज्य की वैश्विक पर्यटन प्रोफ़ाइल को और मजबूत कर सकती है।
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर असर
मुख्यमंत्री चौधरी ने कहा कि बिहार की धरती के नीचे अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर सुरक्षित हैं। इनके वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन और संरक्षण से राज्य के इतिहास के नए अध्याय सामने आएंगे। साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुरूप चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभव मिल सके।