सीजीएचएस घोटाला: सीबीआई कोर्ट ने पूर्व रजिस्ट्रार आर.के. श्रीवास्तव समेत 7 दोषियों को 2 साल की कठोर कैद सुनाई
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने 'लोक प्रिय को-ऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी' (सीजीएचएस) को धोखाधड़ी से पुनर्जीवित करने के मामले में सात दोषियों को 2-2 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई है। दोषियों में को-ऑपरेटिव सोसाइटीज के तत्कालीन रजिस्ट्रार आर.के. श्रीवास्तव और तत्कालीन असिस्टेंट रजिस्ट्रार पी.एन. मनचंदा सहित पाँच अन्य व्यक्ति शामिल हैं। यह मामला 1970-1980 के दशक में पंजीकृत निष्क्रिय सहकारी आवास समितियों की धोखाधड़ीपूर्ण बहाली से जुड़ा है।
मामले का पूरा घटनाक्रम
सीबीआई ने सितंबर 2006 में यह मामला दर्ज किया था, जब जांच में सामने आया कि आरोपियों ने 1970 से 1980 के बीच पंजीकृत और बाद में बंद हो चुकी सहकारी समूह आवास समितियों को धोखाधड़ी से फिर से सक्रिय करने की साजिश रची थी। जांच में खुलासा हुआ कि आरोपियों ने रजिस्ट्रार कार्यालय के अधिकारियों से मिलकर जाली दस्तावेज तैयार किए और उनके आधार पर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) से भूमि आवंटन हासिल किया।
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने दिल्ली की सक्षम अदालत में आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की। अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद 14 जुलाई को सभी सात आरोपियों को दोषी ठहराया और 30 अगस्त को सजा का ऐलान किया।
दोषियों की पहचान और सजा का विवरण
दोषी ठहराए गए सात व्यक्तियों में दो सरकारी अधिकारी — तत्कालीन रजिस्ट्रार आर.के. श्रीवास्तव और तत्कालीन असिस्टेंट रजिस्ट्रार पी.एन. मनचंदा — तथा पाँच निजी व्यक्ति — के.के. वाधवा, अनिल कुमार, सुनील कुमार, देवेंद्र पाल सिंह और रवि सलूजा शामिल हैं।
दोनों सरकारी कर्मचारियों को 2 साल की कठोर कैद के साथ प्रत्येक पर ₹75,000 का जुर्माना लगाया गया है। अन्य पाँच दोषियों को धोखाधड़ी, जाली दस्तावेजों के उपयोग और आपराधिक साजिश के अपराधों में 2 साल की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
साजिश की कार्यप्रणाली
जांच के अनुसार, आरोपियों ने सुनियोजित ढंग से काम किया। पहले निष्क्रिय सोसाइटियों के रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई, फिर जाली कागज़ात के ज़रिए सोसाइटी को 'सक्रिय' दिखाया गया, और अंततः डीडीए से भूमि आवंटन प्राप्त किया गया। गौरतलब है कि इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी अधिकारियों की संलिप्तता ने इसे और गंभीर बना दिया, क्योंकि वही अधिकारी इन समितियों के पंजीकरण और नियमन के लिए ज़िम्मेदार थे।
लखनऊ में रिश्वत मामले में भी सजा
इसी क्रम में लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने एक अलग रिश्वत मामले में रायबरेली दरियापुर जंक्शन रेलवे स्टेशन के तत्कालीन गुड्स क्लर्क दुर्गेश बहादुर सिंह को दोषी ठहराते हुए 4 साल की जेल और ₹10,000 के जुर्माने की सजा सुनाई।
सीबीआई ने 13 अक्टूबर 2017 को मैसर्स आरडी सीमेंट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के निदेशक की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया था। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने कंपनी पर लगाए गए ₹1,26,000 के डेमरेज चार्ज (विलंब शुल्क) को कम करवाने के एवज़ में ₹60,000 की रिश्वत माँगी थी। सीबीआई ने जाल बिछाकर आरोपी को ₹7,200 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।
आगे क्या होगा
दोनों मामलों में सजा सीबीआई की भ्रष्टाचार-विरोधी कार्रवाइयों की निरंतरता को दर्शाती है। यह ऐसे समय में आई है जब सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित न्याय की माँग लगातार बढ़ रही है। दोषियों के पास उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है।