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दही हांडी परंपरा: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों बनता है मानव पिरामिड, जानें श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी कहानी

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दही हांडी परंपरा: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों बनता है मानव पिरामिड, जानें श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी कहानी

सारांश

जन्माष्टमी के अगले दिन मनाई जाने वाली दही हांडी कोई आधुनिक आयोजन नहीं — यह भगवान श्रीकृष्ण की उस बाल लीला की जीवंत याद है जब कान्हा ने अपने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर गोपियों की ऊँची मटकी फोड़ी थी। सहयोग, साहस और भक्ति का यह उत्सव आज महाराष्ट्र से निकलकर पूरे भारत में फैल चुका है।

मुख्य बातें

दही हांडी उत्सव हर वर्ष जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का प्रतीकात्मक पुनर्मंचन है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, कान्हा अपने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर गोकुल में गोपियों की ऊँची मटकी फोड़ते थे।
उत्सव में गोविंदा दल मटकी तक पहुँचकर उसे फोड़ते हैं; सफल दल को विशेष पुरस्कार दिया जाता है।
महाराष्ट्र , विशेषकर मुंबई , में यह उत्सव सबसे भव्य रूप से मनाया जाता है।
अब यह परंपरा राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में लोकप्रिय हो चुकी है।

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से प्रेरित दही हांडी का उत्सव हर वर्ष जन्माष्टमी के अगले दिन पूरे देश में, विशेष रूप से महाराष्ट्र में, अपार उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह परंपरा कान्हा की उस नटखट बाल लीला का जीवंत पुनर्मंचन है, जिसमें वे अपने सखाओं के साथ मिलकर ऊँचाई पर टँगी माखन-दही की मटकी फोड़ा करते थे।

बाल कृष्ण की शरारत से जन्मी परंपरा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को बचपन से ही माखन और दही अत्यंत प्रिय थे। वे गोकुल की गलियों में अपने बाल-सखाओं के साथ विचरण करते और अवसर मिलते ही किसी भी घर से माखन-दही की मटकी चुरा लेते। उनकी इस मनोहर शरारत से गोपियाँ प्रायः परेशान रहती थीं, फिर भी कान्हा के प्रति उनका स्नेह कम न होता था।

गौरतलब है कि श्रीकृष्ण की यह लीला केवल चोरी नहीं थी — यह उनके भक्तों के साथ प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में इसे 'माखन लीला' के रूप में वर्णित किया गया है।

मटकी ऊँची हुई, पर कान्हा न रुके

कहा जाता है कि जब गोपियों ने माखन बचाने के लिए मटकी को जमीन से काफी ऊँचाई पर लटकाना शुरू किया, तब भी नटखट कान्हा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने मित्रों को एकत्र किया और सबने मिलकर एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाया। सबसे ऊपर पहुँचने वाले सखा ने मटकी फोड़ दी और सभी ने मिलकर माखन-दही का आनंद लिया। इसी दृश्य को आज दही हांडी उत्सव में प्रतीकात्मक रूप से दोहराया जाता है।

दही हांडी उत्सव: कैसे मनाया जाता है

दही हांडी के दिन एक बड़ी मटकी में दही, माखन, दूध और अन्य सामग्री भरकर उसे रस्सी की सहायता से काफी ऊँचाई पर बाँधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियाँ — जिन्हें परंपरागत रूप से 'गोविंदा' कहा जाता है — मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुँचने का प्रयास करती हैं। सबसे ऊपर चढ़ा गोविंदा मटकी फोड़ता है और दही-माखन नीचे गिरते ही पूरा वातावरण ढोल-नगाड़ों, जयकारों और भजनों से गूँज उठता है।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में भक्ति और सांस्कृतिक उत्सवों की ओर युवाओं की रुचि फिर से बढ़ रही है। दही हांडी इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक जीवंत उदाहरण है।

महाराष्ट्र में विशेष धूम

महाराष्ट्र में, विशेषकर मुंबई में, दही हांडी उत्सव का उत्साह अतुलनीय है। यहाँ अत्यंत ऊँचाई पर हांडियाँ बाँधी जाती हैं और विभिन्न गोविंदा पथकों (दलों) के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। जो दल मटकी तोड़ने में सफल होता है, उसे विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। अब यह उत्सव राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में भी लोकप्रिय हो चुका है।

परंपरा का सांस्कृतिक महत्त्व

दही हांडी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है — यह सामूहिकता, सहयोग और साहस का उत्सव है। मानव पिरामिड बनाने में एकता और विश्वास की आवश्यकता होती है, जो इस परंपरा को सामाजिक दृष्टि से भी अर्थपूर्ण बनाती है। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत से जोड़ती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका सांस्कृतिक आयाम कहीं अधिक गहरा है — यह सामूहिकता और सहयोग का वह पाठ है जो श्रीकृष्ण ने बचपन में ही दे दिया था। मुख्यधारा की कवरेज प्रायः प्रतियोगिता और पुरस्कार पर केंद्रित रहती है, जबकि इस परंपरा की असली शक्ति उस मानव पिरामिड में है जो बिना एक-दूसरे के विश्वास के खड़ा नहीं हो सकता। यह विरोधाभास भी ध्यान देने योग्य है कि जो उत्सव 'चोरी' की लीला पर आधारित है, वह आज सबसे बड़ा सामुदायिक एकता का प्रतीक बन चुका है। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है — वह नटखटपन में भी गहरा दर्शन खोज लेती है।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दही हांडी जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों मनाई जाती है?
दही हांडी जन्माष्टमी के अगले दिन इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण की उस बाल लीला का प्रतीकात्मक पुनर्मंचन है, जिसमें वे गोकुल में अपने सखाओं के साथ मिलकर गोपियों की ऊँची मटकी फोड़ा करते थे। जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है और अगले दिन उनकी बाल लीलाओं को इस उत्सव के माध्यम से जीवंत किया जाता है।
दही हांडी की परंपरा कहाँ से शुरू हुई?
दही हांडी की परंपरा की जड़ें भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में हैं, जो पौराणिक ग्रंथों में वर्णित हैं। महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई, में यह उत्सव सबसे भव्य रूप से मनाया जाता है और वहीं से इसने पूरे देश में लोकप्रियता हासिल की।
गोविंदा कौन होते हैं और वे क्या करते हैं?
गोविंदा उन युवाओं की टोलियों को कहा जाता है जो दही हांडी उत्सव में मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बँधी मटकी तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। सबसे ऊपर पहुँचने वाला गोविंदा मटकी फोड़ता है, जिसके बाद दही-माखन नीचे गिरता है और उत्सव का माहौल चरम पर पहुँच जाता है।
दही हांडी में क्या भरा जाता है?
परंपरागत रूप से दही हांडी की मटकी में दही, माखन, दूध और अन्य सामग्री भरी जाती है। यह भगवान श्रीकृष्ण की माखन-दही के प्रति प्रीति का प्रतीक है।
दही हांडी का सांस्कृतिक महत्त्व क्या है?
दही हांडी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है — यह सामूहिकता, सहयोग और साहस का उत्सव है। मानव पिरामिड बनाने में परस्पर विश्वास और एकता की आवश्यकता होती है, जो इसे सामाजिक दृष्टि से भी गहरा अर्थ देती है और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।
राष्ट्र प्रेस
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