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दही हांडी 2026: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों मनाई जाती है यह परंपरा, जानें श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी कहानी

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दही हांडी 2026: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों मनाई जाती है यह परंपरा, जानें श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी कहानी

सारांश

जन्माष्टमी के अगले दिन फूटती मटकी सिर्फ उत्सव नहीं — यह गोकुल की उन गलियों की जीती-जागती याद है जहाँ नटखट कान्हा ने माखन चुराने के लिए पहला मानव पिरामिड खड़ा किया था। सदियों पुरानी यह बाल लीला आज महाराष्ट्र से देशभर में फैल चुकी है।

मुख्य बातें

दही हांडी का उत्सव जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण की माखन-चोरी की बाल लीला पर आधारित है।
गोपियों ने माखन बचाने के लिए मटकी को ऊँचाई पर लटकाया, जिसके जवाब में कान्हा ने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ी।
उत्सव में गोविंदा टोलियाँ दही, माखन और दूध से भरी मटकी तोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाती हैं।
महाराष्ट्र और विशेषकर मुंबई में यह उत्सव विशेष भव्यता के साथ मनाया जाता है, जहाँ विजेता टोली को पुरस्कार दिया जाता है।
यह परंपरा अब देश के अनेक राज्यों में लोकप्रिय हो चुकी है।

जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन मनाई जाने वाली दही हांडी की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण की उस सुप्रसिद्ध बाल लीला पर आधारित है, जिसमें वे गोकुल की गलियों में अपने सखाओं के साथ माखन और दही की मटकी चुराया करते थे। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में इस उत्सव की धूम विशेष रूप से देखने को मिलती है, जहाँ ऊँचाई पर बँधी मटकी तोड़ने के लिए गोविंदाओं की टोलियाँ मानव पिरामिड बनाती हैं।

बाल कृष्ण की माखन-चोरी से जुड़ी पौराणिक पृष्ठभूमि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को बचपन से ही माखन और दही अत्यंत प्रिय थे। वे अपने मित्रों के साथ गोकुल की गलियों में विचरते और जहाँ भी माखन-दही से भरी मटकी दिखती, उसे चतुराई से चुरा लेते। उनकी इस नटखट शरारत से गोपियाँ भले परेशान रहती थीं, किंतु कान्हा की इस लीला को वे मन ही मन प्यार से देखती भी थीं।

गौरतलब है कि गोपियों ने माखन बचाने के लिए मटकी को जमीन से काफी ऊँचाई पर लटकाना शुरू किया। परंतु नटखट कान्हा ने इसका भी तोड़ निकाल लिया — वे अपने सखाओं को एकत्र करते, सभी मिलकर एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते और सबसे ऊपर पहुँचा साथी मटकी फोड़ देता। इसके बाद सभी मिलकर माखन-दही का आनंद उठाते।

दही हांडी उत्सव का स्वरूप और परंपरा

इसी बाल लीला को प्रतीकात्मक रूप से जीवंत करती है दही हांडी की परंपरा। उत्सव में एक बड़ी मटकी में दही, माखन, दूध और अन्य सामग्री भरकर उसे रस्सी के सहारे काफी ऊँचाई पर बाँधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियाँ — जिन्हें गोविंदा कहा जाता है — मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुँचने का प्रयास करती हैं।

सबसे ऊपर चढ़ा गोविंदा जैसे ही मटकी फोड़ता है, दही और अन्य सामग्री नीचे गिरती है और पूरा वातावरण ढोल-नगाड़ों, जयकारों और भजनों से गूँज उठता है। यह क्षण उत्सव का सबसे भावपूर्ण और ऊर्जावान पल होता है।

महाराष्ट्र में उत्सव का विशेष महत्त्व

महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई, में दही हांडी उत्सव की भव्यता अलग ही स्तर पर होती है। यहाँ कई-कई मंजिल ऊँचाई पर मटकियाँ बाँधी जाती हैं और विभिन्न मंडलों की गोविंदा टोलियाँ उन्हें तोड़ने की प्रतिस्पर्धा में उतरती हैं। जो टोली मटकी तोड़ने में सफल होती है, उसे विशेष पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

यह ऐसे समय में आया है जब यह उत्सव अब केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा — देश के अनेक राज्यों में इसकी धूम देखी जाने लगी है, जो इस परंपरा की व्यापक सांस्कृतिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

आम जनता पर असर और सांस्कृतिक महत्त्व

दही हांडी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह सामूहिकता, सहयोग और उत्साह का प्रतीक भी है। मानव पिरामिड बनाने की प्रक्रिया में टीम भावना, शारीरिक दक्षता और परस्पर विश्वास की आवश्यकता होती है — ठीक वैसे ही जैसे बाल कृष्ण और उनके सखाओं के बीच थी।

आने वाले वर्षों में यह परंपरा और अधिक संगठित रूप लेती जा रही है, जिसमें सुरक्षा मानकों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है ताकि उत्साह के साथ-साथ प्रतिभागियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी जड़ें भारतीय सामूहिकता की उस अवधारणा में हैं जहाँ व्यक्तिगत प्रयास नहीं, सामूहिक संकल्प लक्ष्य तक पहुँचाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि जैसे-जैसे मटकियों की ऊँचाई बढ़ती गई, सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं — जो परंपरा और आधुनिक जवाबदेही के बीच के तनाव को उजागर करते हैं। महाराष्ट्र में इस उत्सव के व्यावसायिक और राजनीतिक आयाम भी विकसित हुए हैं, जो मूल आध्यात्मिक संदर्भ से परे इसकी सांस्कृतिक यात्रा को दर्शाते हैं।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दही हांडी जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों मनाई जाती है?
दही हांडी जन्माष्टमी के अगले दिन इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण की उस बाल लीला का प्रतीकात्मक पुनरावतरण है जिसमें वे अपने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर रखी माखन-दही की मटकी फोड़ते थे। जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है और अगले दिन उनकी बाल लीलाओं को जीवंत किया जाता है।
दही हांडी की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोकुल में गोपियाँ माखन बचाने के लिए मटकी को ऊँचाई पर लटकाती थीं, तो बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुँचते और उसे फोड़ देते थे। इसी लीला की याद में दही हांडी उत्सव की परंपरा शुरू हुई।
गोविंदा कौन होते हैं और दही हांडी में उनकी भूमिका क्या है?
गोविंदा उन युवाओं की टोलियों को कहा जाता है जो दही हांडी उत्सव में मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बँधी मटकी तोड़ने का प्रयास करते हैं। यह नाम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के एक नाम 'गोविंद' से लिया गया है।
महाराष्ट्र में दही हांडी उत्सव इतना प्रसिद्ध क्यों है?
महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई, में दही हांडी उत्सव की विशेष परंपरा रही है जहाँ कई-कई मंजिल ऊँचाई पर मटकियाँ बाँधी जाती हैं और विजेता टोली को बड़े पुरस्कार दिए जाते हैं। यहाँ की भव्यता और प्रतिस्पर्धात्मक भावना ने इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
दही हांडी में मटकी में क्या भरा जाता है?
दही हांडी में मटकी के अंदर दही, माखन, दूध और अन्य सामग्री भरी जाती है, जो बाल कृष्ण की माखन-दही के प्रति प्रियता का प्रतीक है। मटकी फूटने पर यह सामग्री नीचे गिरती है और उत्सव का माहौल जयकारों से गूँज उठता है।
राष्ट्र प्रेस
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