पीएम-उदय योजना: दिल्ली CM रेखा गुप्ता ने केंद्र से माँगे ₹100 करोड़, 45 लाख निवासियों को मिलेगा फायदा
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 12 जुलाई 2026 को केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल को पत्र लिखकर 'प्रधानमंत्री अनधिकृत कॉलोनी आवास अधिकार योजना' (पीएम-उदय) के संशोधित स्वरूप को लागू करने के पहले चरण में ₹100 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता की माँग की है। यह अनुरोध ऐसे समय में आया है जब दिल्ली की 1,731 अनधिकृत कॉलोनियों में बसे 45 लाख से अधिक निवासी दशकों से कानूनी मालिकाना हक की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
पीएम-उदय योजना क्या है और इसमें क्या बदला
पीएम-उदय केंद्र सरकार की वह योजना है जो दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले निवासियों को कानूनी स्वामित्व अधिकार और संपत्ति हस्तांतरण का अधिकार देती है। संशोधित ढाँचे के तहत अब 'जैसी हैं, वैसी हैं' के आधार पर कॉलोनियों को नियमित किया जाएगा — यानी पहले की तरह लेआउट प्लान की पूर्व-स्वीकृति अनिवार्य नहीं होगी।
इस बदलाव से जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी, वसीयत या बिक्री समझौते के ज़रिये रखी गई संपत्तियों को भी कानूनी रूप से रजिस्टर्ड स्वामित्व विलेख में बदला जा सकेगा। योग्य निवासी अब अपनी संपत्ति कानूनी तरीके से बेच सकेंगे और उसके बदले बैंक ऋण भी प्राप्त कर सकेंगे।
मुख्यमंत्री की माँग और पत्र की पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अप्रैल में केंद्र के संशोधित नीति-निर्णय का स्वागत किया था। उन्होंने तब कहा था कि नए ढाँचे के अंतर्गत 1,531 अनधिकृत कॉलोनियों को बिना लेआउट प्लान की मंज़ूरी के नियमित किया जा सकेगा और इन कॉलोनियों के सभी प्लॉट व इमारतों को आवासीय संपत्ति माना जाएगा।
उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि राजस्व अधिकारियों द्वारा संयुक्त सर्वे तय समय-सीमा में पूरे किए जाएँगे। योजना के अनुसार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) का जीआईएस सर्वे 7 दिनों में, कमियों का निराकरण 15 दिनों में और कन्वेयंस डीड (स्वामित्व हस्तांतरण विलेख) 45 दिनों के भीतर जारी किए जाएँगे।
केंद्र का रुख और अप्रैल की घोषणा
केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने अप्रैल में 1,511 अनधिकृत कॉलोनियों को 'जैसी हैं, वैसी हैं' के आधार पर नियमित करने की घोषणा करते हुए मंजूरशुदा लेआउट प्लान की पुरानी अनिवार्यता समाप्त की थी। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि सैनिक फार्म और अनंत राम डेयरी समेत 60 से अधिक संपन्न अनधिकृत कॉलोनियों को भी नियमित करने पर विचार किया जाएगा, हालाँकि उनके निवासियों को अधिक शुल्क देना होगा। उन शुल्कों का ढाँचा और समय-सीमा अभी तय नहीं की गई है।
गौरतलब है कि दिल्ली की 1,731 अनधिकृत कॉलोनियों में से 511 को तत्काल नियमित करने के लिए चुना गया था।
आम जनता पर असर
ये अनधिकृत कॉलोनियाँ पिछले तीन-चार दशकों में कृषि भूमि पर बसी थीं — राष्ट्रीय राजधानी में किफायती आवास की कमी और तीव्र शहरी विस्तार इसकी मुख्य वजह रहे। संशोधित नीति से 45 लाख से अधिक निवासियों को कानूनी सुरक्षा मिलने की उम्मीद है, जो अब तक अनिश्चित कब्ज़े में जीवन गुज़ार रहे थे।
₹100 करोड़ की वित्तीय सहायता मिलने पर पहले चरण का क्रियान्वयन शुरू हो सकेगा। यह अनुरोध स्वीकार होता है या नहीं, यह केंद्र-राज्य समन्वय की दिशा तय करेगा।