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डूसू चुनाव 2026: हिंसा और लिंगदोह उल्लंघन पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त, एएसएपी ने रखा अपना पक्ष

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डूसू चुनाव 2026: हिंसा और लिंगदोह उल्लंघन पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त, एएसएपी ने रखा अपना पक्ष

सारांश

डूसू चुनाव 2026 में लॉ फैकल्टी हिंसा और लिंगदोह नियमों के उल्लंघन पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त — सभी छात्र संगठनों को नोटिस, नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक जिम्मेदारी तय करने का संकेत। एएसएपी ने कोर्ट में अनुपालन का भरोसा दिलाया।

मुख्य बातें

दिल्ली हाई कोर्ट ने 19 सितंबर 2026 को डूसू चुनाव 2026 मामले में हिंसा और लिंगदोह कमेटी के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाया।
कोर्ट ने एएसएपी सहित सभी राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों को नोटिस जारी कर लगभग एक महीने में जवाब माँगा।
कोर्ट ने संकेत दिया कि नियम तोड़ने वाले छात्र या संगठन को नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
लॉ फैकल्टी हिंसा में दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारियाँ की हैं।
याचिकाकर्ताओं ने गाड़ियों, पैम्फलेट और पोस्टरों के प्रयोग तथा बाहरी लोगों की भागीदारी को लिंगदोह उल्लंघन बताया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 19 सितंबर 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव 2026 से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव प्रचार के दौरान हुई हिंसा और लिंगदोह कमेटी के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाया। आम आदमी पार्टी (AAP) के छात्र संगठन एएसएपी (ASAP) की ओर से अधिवक्ता आशु बिधूड़ी ने अदालत में संगठन का पक्ष प्रस्तुत किया।

मामले की पृष्ठभूमि

अधिवक्ता बिधूड़ी के अनुसार, यह मामला मुख्यतः लॉ फैकल्टी में चुनाव से पहले हुई हिंसा और चुनाव प्रचार के दौरान लिंगदोह कमेटी की गाइडलाइंस के खुले उल्लंघन से जुड़ा है। आरोप है कि इस हिंसा में न केवल छात्र, बल्कि बाहरी लोग भी शामिल थे। विशेष रूप से गाड़ियों, पैम्फलेट और पोस्टरों का उपयोग किया गया — जो हाई कोर्ट और लिंगदोह कमेटी के आदेशों के तहत स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित हैं।

गौरतलब है कि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित हैं, छात्र संघ चुनावों में खर्च, प्रचार सामग्री और बाहरी हस्तक्षेप पर सख्त पाबंदी लगाती हैं। डूसू जैसे बड़े विश्वविद्यालयों के चुनावों में इन नियमों का उल्लंघन पहले भी विवाद का विषय रहा है।

अदालत की सख्त टिप्पणियाँ

बिधूड़ी ने बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने यह प्रश्न उठाया कि क्या लोकतंत्र के नाम पर एक 'आपराधिक समाज' तैयार किया जा रहा है और क्या बाहरी तत्व विश्वविद्यालय चुनावों को प्रभावित करने में जुटे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि यदि कोई छात्र या छात्र संगठन लिंगदोह गाइडलाइंस का उल्लंघन करते पाया गया, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

कोर्ट के मौजूदा रुख के अनुसार, नियम तोड़ने वाले राजनीतिक दल या छात्र को नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए — यह एक उल्लेखनीय कदम है जो भविष्य के चुनावों में बाधक तत्वों को हतोत्साहित कर सकता है।

याचिकाकर्ताओं की मांग और कोर्ट का आदेश

याचिकाकर्ताओं ने हिंसा और नियम-उल्लंघन का हवाला देते हुए डूसू चुनाव पर रोक लगाने की मांग रखी थी। इस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने एएसएपी सहित सभी राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों को नोटिस जारी किए और जवाब दाखिल करने के लिए लगभग एक महीने का समय दिया।

अधिवक्ता बिधूड़ी ने स्पष्ट किया कि एएसएपी की ओर से कोर्ट को सूचित किया गया कि उनका संगठन निर्धारित नियमों का पालन कर रहा है।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई

लॉ फैकल्टी में हुई हिंसा के सिलसिले में दिल्ली पुलिस पहले ही सक्रिय हो चुकी है। पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है और कई गिरफ्तारियाँ भी की जा चुकी हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब डूसू का चुनाव हर वर्ष राष्ट्रीय दलों — विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की छात्र शाखा एबीवीपी और कांग्रेस से जुड़े एनएसयूआई — के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन जाता है।

आगे क्या होगा

अब सभी संबंधित छात्र संगठनों को एक महीने के भीतर अदालत में अपना जवाब दाखिल करना होगा। कोर्ट की अगली सुनवाई में यह निर्धारित हो सकता है कि किसी संगठन के विरुद्ध आर्थिक दायित्व तय किया जाए या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देशभर के विश्वविद्यालय चुनावों में लिंगदोह गाइडलाइंस के अनुपालन के लिए एक मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी अनुपालन सुनिश्चित करने का तंत्र कमज़ोर रहा है — यही वह चक्र है जिसे दिल्ली हाई कोर्ट इस बार तोड़ने का प्रयास कर रहा है। आर्थिक जिम्मेदारी का संकेत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब तक उल्लंघन की कोई वास्तविक कीमत नहीं चुकानी पड़ती थी। असली सवाल यह है कि क्या एक महीने की नोटिस अवधि और संभावित दंड वास्तव में बाहरी हस्तक्षेप रोकेंगे, या यह भी अदालती निर्देशों की उस लंबी सूची में जुड़ जाएगा जो हर चुनाव के बाद दोहराए जाते हैं पर लागू नहीं होते।
RashtraPress
19 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डूसू चुनाव 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट का मामला क्या है?
यह मामला डूसू चुनाव के दौरान लॉ फैकल्टी में हुई हिंसा और लिंगदोह कमेटी के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने गाड़ियों, पोस्टरों और पैम्फलेट के प्रयोग तथा बाहरी लोगों की भागीदारी का हवाला देते हुए चुनाव पर रोक लगाने की मांग की थी।
लिंगदोह कमेटी की गाइडलाइंस क्या हैं और इनका उल्लंघन क्यों गंभीर है?
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित हैं, छात्र संघ चुनावों में प्रचार खर्च, वाहनों के उपयोग, पोस्टर-बैनर और बाहरी हस्तक्षेप पर सख्त पाबंदी लगाती हैं। इनका उल्लंघन न केवल न्यायालय की अवमानना है, बल्कि चुनाव की निष्पक्षता को भी कमज़ोर करता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कार्रवाई की है?
कोर्ट ने एएसएपी सहित सभी राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों को नोटिस जारी कर लगभग एक महीने में जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि नियम तोड़ने वाले संगठन या छात्र को नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
एएसएपी ने कोर्ट में क्या कहा?
आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन एएसएपी की ओर से अधिवक्ता आशु बिधूड़ी ने अदालत को बताया कि संगठन लिंगदोह कमेटी के नियमों का पालन कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एएसएपी का किसी उल्लंघन में कोई हाथ नहीं है।
लॉ फैकल्टी हिंसा मामले में पुलिस ने क्या कदम उठाए हैं?
दिल्ली पुलिस ने लॉ फैकल्टी में हुई हिंसा के संबंध में एफआईआर दर्ज कर ली है और इस मामले में गिरफ्तारियाँ भी की जा चुकी हैं। पुलिस की जाँच जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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