दिल्ली पुलिस ने बिहार से बरामद कीं दो लापता नाबालिग लड़कियाँ, इस साल 46 लोग मिले
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली से लापता हुईं दो नाबालिग लड़कियों को बिहार से सफलतापूर्वक बरामद कर लिया है। 26 जुलाई 2026 को सामने आई इस कार्रवाई के साथ, एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU), सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट ने इस वर्ष कुल 46 लापता व्यक्तियों को बरामद करने का आँकड़ा पार कर लिया। दोनों पीड़िताओं को दिल्ली वापस लाकर उनके संबंधित जाँच अधिकारियों को सौंप दिया गया है।
मुख्य घटनाक्रम
पुलिस ने नाबालिगों की तलाश के लिए व्यापक अभियान चलाया, जिसमें सीसीटीवी फुटेज की जाँच के साथ-साथ लगभग 140 अनाथालयों, शेल्टर होम, धार्मिक स्थलों और रेड-लाइट क्षेत्रों की छानबीन की गई। स्थानीय खुफिया जानकारी के आधार पर पंजाब और बिहार में भी सर्च ऑपरेशन चलाए गए। जाँच के दौरान पुलिस को एक पीड़िता से जुड़े मोबाइल नंबर की अहम जानकारी हाथ लगी।
तकनीकी निगरानी से मिली सफलता
पुलिस के अनुसार, उस मोबाइल नंबर को तत्काल तकनीकी निगरानी पर रखा गया। शुरुआती ट्रैकिंग में पीड़िता बिहार के सहरसा जिले में चिह्नित हुई। 22 जुलाई को पुलिस टीम सहरसा पहुँची, लेकिन तब तक हैंडसेट सुपौल में स्थानांतरित हो चुका था। सुपौल पुलिस के सहयोग से टीम ने तेज़ी से कार्रवाई करते हुए पहली नाबालिग लड़की को सफलतापूर्वक बरामद किया।
दूसरी पीड़िता की बरामदगी
आनंद पर्वत की रहने वाली 15 वर्षीया दूसरी पीड़िता के लापता होने का मामला 12 दिसंबर 2025 को दर्ज हुआ था। जाँच में पता चला कि वह बिहार के मधुबनी में देखी गई थी। पुलिस टीम तत्काल मधुबनी के बेनीपट्टी पहुँची, परंतु तब तक पीड़िता साहरघाट जा चुकी थी। स्थानीय पुलिस की मदद से टीम ने वहाँ पहुँचकर उसे बरामद किया।
जाँच में चौंकाने वाला खुलासा
जाँच से यह भी सामने आया कि पीड़िताओं ने पुलिस से बचने के लिए जानबूझकर अपनी लोकेशन और सिम कार्ड बदले। यह तथ्य मामले की जटिलता को उजागर करता है और यह सवाल खड़ा करता है कि नाबालिगों तक किसका प्रभाव था। दोनों बरामद लड़कियों की सही पहचान कर उन्हें आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए संबंधित अधिकारियों को सौंपा गया।
आगे क्या होगा
दोनों मामलों में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है। AHTU सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट की इस साल की बरामदगी का आँकड़ा अब 46 पर पहुँच गया है, जो लापता नाबालिगों की तलाश में पुलिस की बढ़ती सक्रियता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी निगरानी और अंतर-राज्यीय समन्वय इस सफलता की कुंजी रही।