जंतर-मंतर प्रदर्शन: महिला प्रदर्शनकारियों से मारपीट के दावों पर दिल्ली पुलिस बोली — आरोप निराधार
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित शारीरिक मारपीट के सोशल मीडिया दावों को दिल्ली पुलिस ने 5 अक्टूबर 2026 को आधिकारिक रूप से खारिज किया है। डीसीपी नई दिल्ली की ओर से जारी बयान में कहा गया कि ये आरोप 'निराधार और भ्रामक' हैं तथा घटनाओं के वास्तविक क्रम को नहीं दर्शाते। यह सफाई ऐसे समय आई है जब 3 अक्टूबर 2026 को हुए प्रदर्शन के बाद से सोशल मीडिया पर पुलिस के खिलाफ आरोपों की बाढ़ आ गई थी।
मुख्य घटनाक्रम
3 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (AISA) और अन्य दलों ने एसआईआर (SIR) के विरोध में प्रदर्शन किया। उस समय नई दिल्ली क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी। डीसीपी नेहा यादव के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को निषेधाज्ञा की जानकारी दी गई और हटने की चेतावनी दी गई, लेकिन निर्देश का पालन न होने पर उन्हें हिरासत में लिया गया।
शाम करीब 6 बजे खुद को पत्रकार बताने वाली तीन महिलाओं ने हिरासत के दौरान दिल्ली पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर कथित बदसलूकी की शिकायत दर्ज कराई। इन तीनों की शिकायतें स्वीकार की गईं, उनका मेडिकल परीक्षण कराया गया और शिकायतें क्राइम ब्रांच को सौंप दी गईं।
दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया
पुलिस ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया कि महिला प्रदर्शनकारियों को हमेशा महिला पुलिसकर्मियों द्वारा ही संभाला जाता है और उनके साथ गरिमा तथा उचित सम्मान के साथ व्यवहार किया जाता है। डीसीपी नई दिल्ली ने कहा कि सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावे तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।
पुलिस ने हिरासत और रिहाई की प्रक्रिया को भी स्पष्ट करते हुए कहा कि यह कार्रवाई लागू कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार की जाती है। हिरासत में लिए गए पुरुष प्रदर्शनकारियों को भी निर्धारित समय के भीतर कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए रिहा किया गया।
महिला पत्रकारों के आरोप और जांच
तीन महिला पत्रकारों ने 3 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के समय पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के कथित आरोप लगाए थे। 4 अक्टूबर को पुलिस ने बताया था कि तीनों महिला पत्रकारों की शिकायतें नई दिल्ली जिला पुलिस को मिली हैं और निष्पक्ष जांच के लिए इन्हें क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित किया गया है। इन शिकायतों में लगाए गए आरोपों की सत्यता अभी जांच का विषय है।
गौरतलब है कि पुलिस अधिकारी ने कथित घटना का वीडियो रखने वाले लोगों से भी इसे क्राइम ब्रांच के साथ साझा करने की अपील की थी, ताकि जांच में मदद मिल सके।
आम जनता और मीडिया पर असर
यह मामला ऐसे समय में सुर्खियों में आया है जब पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के आचरण को लेकर राष्ट्रीय बहस गर्म है। सोशल मीडिया पर आरोपों और पुलिस के जवाब के बीच जनता दो हिस्सों में बँटी नज़र आ रही है। विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों ने जांच को पारदर्शी बनाने की माँग की है।
क्या होगा आगे
तीनों महिला पत्रकारों की शिकायतों पर क्राइम ब्रांच की जांच जारी है। जांच का परिणाम इस मामले की दिशा तय करेगा — यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो पुलिस की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े होंगे, और यदि निराधार पाए जाते हैं तो सोशल मीडिया पर झूठी सूचनाओं के प्रसार पर कार्रवाई की संभावना बनेगी।