19 अगस्त 2026
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महाराष्ट्र धर्मांतरण कानून पर मौलाना मुश्ताक मलिक का विरोध, बोले — यह व्यक्ति की आस्था का मामला

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महाराष्ट्र धर्मांतरण कानून पर मौलाना मुश्ताक मलिक का विरोध, बोले — यह व्यक्ति की आस्था का मामला

सारांश

महाराष्ट्र के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून पर तहरीक मुस्लिम शब्बान के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक मलिक ने कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि धर्म परिवर्तन व्यक्ति की अंतरात्मा का मामला है, और कानून की अस्पष्टता इसे दमन का औज़ार बना सकती है।

मुख्य बातें

तहरीक मुस्लिम शब्बान के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक मलिक ने 19 अगस्त को महाराष्ट्र के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था और विचार का परिणाम है — राज्य का जबरन हस्तक्षेप उचित नहीं।
कानून के उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई जो धर्म परिवर्तन के बाद बच्चों की धार्मिक पहचान और संपत्ति उत्तराधिकार से जुड़े हैं।
अंतरधार्मिक विवाह को ' लव जिहाद ' कहने को अनुचित बताया; इसे संवैधानिक अधिकारों के नज़रिये से देखने की माँग की।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि न्यायपालिका भी वयस्कों के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को मान्यता देती है।
इस्लाम में भी जबरन धर्मांतरण निषिद्ध है — कानून की अस्पष्टता निर्दोषों पर दबाव का ज़रिया बन सकती है।

महाराष्ट्र में प्रस्तावित जबरन धर्म परिवर्तन विरोधी कानून को लेकर जारी बहस के बीच तहरीक मुस्लिम शब्बान के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक मलिक ने 19 अगस्त को इस विधेयक के प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि धर्म परिवर्तन किसी व्यक्ति की अंतरात्मा, विचार और व्यक्तिगत आस्था से जुड़ा निर्णय है — इसमें राज्य का जबरन हस्तक्षेप संविधानसम्मत नहीं है।

कानून के प्रावधानों पर आपत्ति

मौलाना मलिक ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित राज्यों में इस तरह के कानून अलग-अलग रूपों में सामने आए हैं और उनमें अस्पष्टता का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने विशेष रूप से उन प्रावधानों पर सवाल उठाए जो धर्म परिवर्तन के बाद पैदा हुए बच्चों की धार्मिक पहचान और संपत्ति में उत्तराधिकार से संबंधित हैं।

उनके अनुसार, यदि जबरन धर्म परिवर्तन साबित हो और उससे संतान उत्पन्न हुई हो, तो बच्चे की कस्टडी माँ के पास रखने का प्रावधान अपने आप में आपत्तिजनक नहीं है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसे बच्चे को दोनों पक्षों की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाने की बात होती है, तो यह शरीयत के विरासत-संबंधी प्रावधानों से टकराव पैदा कर सकती है।

'लव जिहाद' की अवधारणा पर सीधा प्रहार

मौलाना मलिक ने अंतरधार्मिक विवाह को 'लव जिहाद' की संज्ञा देने का स्पष्ट विरोध किया। उनका तर्क था कि प्रेम और जिहाद दो सर्वथा भिन्न अवधारणाएँ हैं और किसी भी अंतरधार्मिक विवाह को केवल धर्म के आधार पर इस राजनीतिक शब्द से परिभाषित करना न्यायसंगत नहीं है।

उन्होंने कहा कि यदि दो वयस्क व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से विवाह करते हैं और उनमें से किसी एक का धर्म भिन्न है, तो इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय उनके संवैधानिक अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का संदर्भ

मौलाना ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि दो वयस्क बहनों के धर्म परिवर्तन और विवाह से जुड़े प्रकरण में अदालत ने उनकी वयस्कता और स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को प्राथमिकता दी थी। अदालत ने संबंधित पक्षों पर जुर्माना भी लगाया था। उन्होंने इस उदाहरण के ज़रिये यह रेखांकित किया कि न्यायपालिका भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानती है।

इस्लाम में जबरन धर्मांतरण की अनुमति नहीं

मौलाना मलिक ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्लाम में भी किसी व्यक्ति को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना निषिद्ध है। उनके अनुसार, कानून में यदि अस्पष्टता रहती है तो उसका इस्तेमाल निर्दोष लोगों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। किसी व्यक्ति की धार्मिक पसंद को केवल सामाजिक संदेह या बाहरी दबाव के आधार पर अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।

आगे क्या

महाराष्ट्र सरकार की ओर से प्रस्तावित इस कानून पर विभिन्न धार्मिक और नागरिक समाज संगठनों की प्रतिक्रियाएँ आना जारी हैं। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि विधानसभा में विधेयक पेश होने से पहले सरकार इन आपत्तियों पर किस हद तक विचार करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिन पर अदालतों में बार-बार सवाल उठे हैं। मौलाना मलिक की आपत्तियाँ केवल सांप्रदायिक नहीं हैं — उनका कानूनी आधार भी है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय और कई उच्च न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को धर्म-परिवर्तन के मामलों में सर्वोपरि मान चुके हैं। असली सवाल यह है कि 'जबरन' की परिभाषा कानून में कितनी स्पष्ट है — क्योंकि अस्पष्ट परिभाषाएँ ही अतीत में अल्पसंख्यकों और अंतरधार्मिक जोड़ों के उत्पीड़न का आधार बनी हैं। शरीयत से टकराव वाला बिंदु संवैधानिक रूप से जटिल है और इस पर न्यायिक परीक्षण अनिवार्य हो सकता है।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र का प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून क्या है?
यह महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रस्तावित एक विधेयक है जिसका उद्देश्य जबरन या प्रलोभन देकर किए जाने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है। इसमें धर्म परिवर्तन के बाद बच्चों की कस्टडी और संपत्ति उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधान भी शामिल बताए जा रहे हैं।
मौलाना मुश्ताक मलिक ने इस कानून का विरोध क्यों किया?
मौलाना मलिक का कहना है कि धर्म परिवर्तन व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था और विचार से जुड़ा मामला है, जिसमें राज्य का हस्तक्षेप संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि कानून की अस्पष्टता का दुरुपयोग निर्दोष लोगों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
क्या इस्लाम में जबरन धर्मांतरण की अनुमति है?
नहीं। मौलाना मलिक ने स्पष्ट किया कि इस्लाम में भी किसी को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना निषिद्ध है। उनके अनुसार, धर्म स्वीकार करना व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्र पसंद होनी चाहिए।
'लव जिहाद' पर मौलाना मलिक का क्या कहना है?
मौलाना मलिक ने कहा कि प्रेम और जिहाद दो अलग अवधारणाएँ हैं और किसी अंतरधार्मिक विवाह को केवल धर्म के आधार पर 'लव जिहाद' कहना अनुचित है। उनके अनुसार, दो वयस्कों के स्वैच्छिक विवाह को संवैधानिक अधिकारों के नज़रिये से देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक चश्मे से।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के किस फैसले का मौलाना ने उल्लेख किया?
मौलाना मलिक ने दो वयस्क बहनों के धर्म परिवर्तन और विवाह से जुड़े एक मामले का हवाला दिया, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी वयस्कता और स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को महत्व दिया था और संबंधित पक्षों पर जुर्माना लगाया था।
राष्ट्र प्रेस
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