18 अगस्त 2026
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महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026: रक्षा बंधन पर लागू, जबरन धर्मांतरण पर 7 साल की सजा

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महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026: रक्षा बंधन पर लागू, जबरन धर्मांतरण पर 7 साल की सजा

सारांश

महाराष्ट्र में रक्षा बंधन अब सिर्फ त्योहार नहीं — एक नए कानून की शुरुआत भी है। 28 अगस्त से लागू धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 जबरन धर्मांतरण पर 7 साल की गैर-जमानती सजा का प्रावधान करता है और विवाह के ज़रिए धर्म परिवर्तन के मामलों में बच्चे की पहचान माँ के मूल धर्म से जोड़ता है।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 रक्षा बंधन यानी 28 अगस्त 2026 से प्रभावी होगा।
गृह विभाग ने 17 अगस्त 2026 को अधिसूचना जारी की; अधिनियम की धारा 1(2) के तहत तिथि निर्धारित।
जबरदस्ती, छल या प्रलोभन से धर्मांतरण कराने पर 7 साल तक की गैर-जमानती सजा का प्रावधान।
स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन के लिए निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष 60 दिन पहले आवेदन अनिवार्य।
केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से किए गए विवाह से जन्मे बच्चे की पहचान माँ के मूल धर्म से मानी जाएगी।
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कानून को महिला सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया।

महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को 28 अगस्त 2026 — रक्षा बंधन के दिन — से प्रभावी करने की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। गृह विभाग द्वारा 17 अगस्त 2026 को जारी इस नोटिफिकेशन में अधिनियम की धारा 1(2) के तहत प्रभावी तिथि निर्धारित की गई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार का कहना है कि यह कानून जबरदस्ती, छल, प्रलोभन या दबाव से कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर पूर्ण रोक लगाएगा।

कानून में क्या है

नए अधिनियम के तहत यदि कोई व्यक्ति बल, छल या लालच के माध्यम से किसी अन्य का धर्म परिवर्तन कराता है, तो उसे सात वर्ष तक की सजा हो सकती है। यह अपराध गैर-जमानती श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि आरोपी को अदालत की अनुमति के बिना जमानत नहीं मिल सकती। यह प्रावधान कानून को विशेष रूप से कठोर बनाता है।

स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए भी एक निर्धारित प्रक्रिया तय की गई है। ऐसे व्यक्ति को संबंधित निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष 60 दिन पहले आवेदन देना होगा, जिसके बाद नियमानुसार प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

विवाह और बच्चों से जुड़े विशेष प्रावधान

कानून का सर्वाधिक चर्चित पहलू वह प्रावधान है जो कथित तौर पर केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए गए विवाह से संबंधित है। जानकारी के अनुसार, यदि कोई विवाह धोखे या छल के आधार पर केवल धर्म परिवर्तन के लिए किया गया पाया जाता है, तो ऐसे विवाह की वैधता और उससे जुड़े कानूनी प्रभावों पर विशेष प्रावधान लागू होंगे।

इसके अतिरिक्त, ऐसे विवाह से जन्म लेने वाले बच्चे की धार्मिक पहचान के संदर्भ में माँ के विवाह-पूर्व मूल धर्म को आधार माना जाएगा। यह प्रावधान कानूनी और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है।

समर्थन में क्या कहा गया

शिवसेना नेता संजय निरुपम ने इस कानून का समर्थन करते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य जबरदस्ती और प्रलोभन से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में शादी के नाम पर महिलाओं को बहलाकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है और बाद में उन्हें छोड़ दिया जाता है।

निरुपम के अनुसार, 'कानून का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं के अधिकारों और उनके मूल धर्म की कानूनी स्थिति की रक्षा करना है।' उन्होंने यह भी कहा कि रक्षा बंधन के दिन इसे लागू करना प्रतीकात्मक रूप से महिला सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि महाराष्ट्र ऐसा कानून लागू करने वाला देश का नवीनतम राज्य बन गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश सहित कई भाजपा-शासित राज्यों में इससे मिलते-जुलते धर्म स्वतंत्रता कानून पहले से लागू हैं। आलोचकों का कहना है कि इन कानूनों के क्रियान्वयन में अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि ये कानून कमजोर वर्गों — विशेषकर महिलाओं — की रक्षा के लिए अनिवार्य हैं।

आगे क्या होगा

28 अगस्त 2026 से कानून के प्रभावी होने के साथ ही राज्य सरकार को क्रियान्वयन नियम, निर्धारित प्राधिकारियों की नियुक्ति और शिकायत तंत्र को अंतिम रूप देना होगा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि विवाह और बच्चों की धार्मिक पहचान से जुड़े प्रावधानों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन विवाह से जन्मे बच्चों की धार्मिक पहचान को माँ के मूल धर्म से जोड़ने वाला प्रावधान कानूनी दृष्टि से नया और विवादास्पद क्षेत्र है। रक्षा बंधन पर लागू करने का प्रतीकात्मक चुनाव राजनीतिक संदेश तो देता है, पर असली परीक्षा क्रियान्वयन में होगी — विशेषकर यह सुनिश्चित करना कि 'जबरन' और 'स्वेच्छा से' धर्मांतरण के बीच की रेखा अदालत में टिकाऊ हो। अन्य राज्यों के अनुभव बताते हैं कि इन कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अभियोजन दर अपेक्षाकृत कम रही है, जो क्रियान्वयन की चुनौतियों को रेखांकित करता है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 क्या है?
यह महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित वह कानून है जो जबरदस्ती, छल, प्रलोभन या दबाव से कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन को दंडनीय अपराध घोषित करता है। यह 28 अगस्त 2026 से प्रभावी होगा और इसके तहत दोषी पाए जाने पर 7 साल तक की गैर-जमानती सजा का प्रावधान है।
यह कानून कब से लागू होगा और इसकी अधिसूचना कब जारी हुई?
गृह विभाग ने 17 अगस्त 2026 को अधिसूचना जारी की और अधिनियम की धारा 1(2) के तहत 28 अगस्त 2026 — रक्षा बंधन — को प्रभावी तिथि निर्धारित की गई है।
स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वालों पर क्या नियम लागू होंगे?
जो व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष 60 दिन पहले आवेदन देना अनिवार्य होगा। इसके बाद नियमानुसार प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
विवाह और बच्चों की धार्मिक पहचान से जुड़े प्रावधान क्या हैं?
यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया पाया जाता है, तो उससे जन्मे बच्चे की धार्मिक पहचान माँ के विवाह-पूर्व मूल धर्म के आधार पर मानी जाएगी। ऐसे विवाह की वैधता पर भी विशेष कानूनी प्रावधान लागू होंगे।
इस कानून को लेकर किन चिंताओं का उल्लेख किया जा रहा है?
आलोचकों का कहना है कि इस तरह के कानूनों के क्रियान्वयन में अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध दुरुपयोग की आशंका रहती है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, विवाह और बच्चों की धार्मिक पहचान से जुड़े प्रावधानों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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