29 अक्टूबर 2026
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ईडी का क्रिप्टो रैकेट पर शिकंजा: बेंगलुरु-MP में छापे, ₹4,600 करोड़ के फेमा उल्लंघन की आशंका

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ईडी का क्रिप्टो रैकेट पर शिकंजा: बेंगलुरु-MP में छापे, ₹4,600 करोड़ के फेमा उल्लंघन की आशंका

सारांश

ईडी की यह कार्रवाई सिर्फ एक छापेमारी नहीं — यह भारत के DeFi और क्रिप्टो-आधारित भुगतान क्षेत्र को सीधी चेतावनी है। ₹4,600 करोड़ के संभावित फेमा उल्लंघन और छह देशों में फैले शेल कंपनियों के जाल ने बताया कि क्रिप्टो के नाम पर नियामकीय खामियों का किस हद तक दोहन हो रहा था।

मुख्य बातें

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 29 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु और मध्य प्रदेश में कई परिसरों पर तलाशी ली।
₹4,600 करोड़ से अधिक के फेमा, 1999 उल्लंघन की आशंका; प्रत्यक्ष रूप से लगभग ₹330 करोड़ (4 करोड़ डॉलर) के लेनदेन की पहचान।
आरपीएफएएस टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड पर RBI की अनुमति के बिना USDT जैसे स्टेबलकॉइन्स से सीमा-पार भुगतान संचालित करने का आरोप।
DeFi प्लेटफॉर्म इंस्टाडप्प (Fluid) से जुड़े परिसरों पर भी छापे; संस्थापक सौमय जैन पर भारत से अमेरिकी कंपनी के रूप में संचालन का आरोप।
कनाडा, लिथुआनिया, अमेरिका, BVI, सिंगापुर और दुबई में शेल कंपनियाँ — न पर्याप्त कर्मचारी, न वास्तविक परिचालन ढाँचा।
जाँच जारी; ईडी ने आने वाले दिनों में और खुलासों के संकेत दिए हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 29 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु और मध्य प्रदेश में कई परिसरों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया, जिसमें स्टेबलकॉइन्स के ज़रिये कथित अवैध सीमा-पार धन हस्तांतरण के व्यापक नेटवर्क का भंडाफोड़ होने के संकेत मिले हैं। प्रारंभिक जाँच में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999 के तहत ₹4,600 करोड़ से अधिक के संभावित उल्लंघन सामने आए हैं, जिनमें कनाडा, लिथुआनिया, अमेरिका, सिंगापुर, दुबई और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स (BVI) में स्थापित कई शेल कंपनियाँ शामिल बताई जा रही हैं।

जाँच की शुरुआत और मुख्य आरोपी कंपनी

ईडी के अनुसार, यह कार्रवाई बेंगलुरु स्थित आरपीएफएएस टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ प्राप्त शिकायतों के आधार पर शुरू हुई। जाँच एजेंसी का आरोप है कि कंपनी कथित तौर पर दो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म संचालित करती थी, जो USDT जैसे स्टेबलकॉइन्स का उपयोग करते हुए अधिकृत बैंकिंग चैनलों को दरकिनार कर अंतरराष्ट्रीय धन हस्तांतरण की सुविधा देते थे।

ईडी के मुताबिक, उपयोगकर्ता पहले प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराते थे, फिर राशि कंपनी के बैंक खाते में जमा कराई जाती थी। उस जमा धन से स्टेबलकॉइन्स खरीदे जाते थे और इन्हें भारतीय एक्सचेंजों पर बेचकर प्राप्त राशि लाभार्थी तक पहुँचाई जाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से अनुमति प्राप्त किसी भी विदेशी प्रेषण चैनल का उपयोग नहीं किया गया।

ऑन-रैम्प/ऑफ-रैम्प मॉडल और शेल कंपनियों का जाल

ईडी का दावा है कि यह नेटवर्क 'ऑन-रैम्प' और 'ऑफ-रैम्प' सेवाओं के ज़रिये फिएट मुद्रा को क्रिप्टो में और फिर क्रिप्टो को वापस नकदी में बदलता था। तलाशी के दौरान एजेंसी को ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे संकेत मिलता है कि कनाडा, लिथुआनिया और अमेरिका सहित अन्य देशों में कई शेल कंपनियाँ स्थापित की गई थीं, और विदेशी क्रिप्टो ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर बड़ी मात्रा में क्रिप्टो संपत्तियाँ रखी गई थीं।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार क्रिप्टो से जुड़े अवैध लेनदेन पर नकेल कसने के लिए फेमा और PMLA दोनों के तहत एक साथ कार्रवाइयाँ तेज़ कर रही है।

इंस्टाडप्प (Fluid) से जुड़े परिसरों पर भी छापे

ईडी ने लोकप्रिय विकेंद्रीकृत वित्त (DeFi) प्लेटफॉर्म इंस्टाडप्प — जो अब बड़े पैमाने पर Fluid नाम से संचालित होता है — से जुड़े परिसरों पर भी तलाशी ली है। उपलब्ध ओपन-सोर्स आँकड़ों के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म पर एक अरब डॉलर से अधिक मूल्य की क्रिप्टो संपत्तियाँ लॉक हैं और अब तक लगभग 14.9 करोड़ डॉलर की फीस अर्जित की जा चुकी है।

ईडी का आरोप है कि इंस्टाडप्प स्वयं को अमेरिकी कंपनी के रूप में प्रस्तुत करता था, लेकिन जाँच में सामने आया कि इसका वास्तविक संचालन और विकास कार्य भारत से किया जा रहा था। एजेंसी के अनुसार, संस्थापक सौमय जैन और उनकी टीम भारत से प्लेटफॉर्म का प्रबंधन कर रही थी, जबकि अमेरिका, BVI, सिंगापुर और दुबई में कई कंपनियाँ स्थापित की गई थीं जिनके पास न तो पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही वास्तविक परिचालन ढाँचा।

फंड का प्रवाह: BVI से सिंगापुर, फिर भारत

ईडी के मुताबिक, प्लेटफॉर्म की आय और निवेशकों से प्राप्त फंड पहले BVI स्थित कंपनियों के मल्टी-सिग्नेचर वॉलेट्स में स्टेबलकॉइन के रूप में जमा होते थे। इसके बाद इन्हें सिंगापुर स्थित ट्रेडिंग प्लेटफॉर्मों पर बेचकर नकद राशि सिंगापुर की संबद्ध कंपनियों के खातों में भेजी जाती थी।

वहाँ से धन भारत में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कंसल्टेंसी शुल्क के नाम पर भेजा जाता था। जाँच में यह भी सामने आया कि सिंगापुर के प्रीपेड बैंक कार्ड भारत में खर्चों के भुगतान के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे और कुछ धनराशि दुबई स्थित बैंक खातों में भी स्थानांतरित की गई।

आगे की जाँच और संभावित कार्रवाई

प्रारंभिक जाँच में ईडी ने लगभग 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर (करीब ₹330 करोड़ से अधिक) के फेमा उल्लंघन की आशंका जताई है, जबकि कुल संभावित उल्लंघन का आँकड़ा ₹4,600 करोड़ से अधिक बताया जा रहा है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि मामले की जाँच अभी जारी है और आने वाले दिनों में और खुलासे हो सकते हैं। गौरतलब है कि यह भारत में DeFi और क्रिप्टो-आधारित सीमा-पार भुगतान के खिलाफ ईडी की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

विदेशी इकाई के रूप में पंजीकृत' मॉडल पर सीधा प्रहार है जो भारतीय क्रिप्टो-टेक स्टार्टअप्स में बेहद प्रचलित रहा है। असली सवाल यह है कि क्या मौजूदा कानूनी ढाँचा — जो मूलतः 1999 का है — इन जटिल बहु-परत वाले DeFi संरचनाओं से निपटने के लिए पर्याप्त है, या फिर देश को क्रिप्टो-विशिष्ट विधायी ढाँचे की ओर तेज़ी से बढ़ना होगा।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईडी ने बेंगलुरु में क्रिप्टो मामले में किस कंपनी पर छापा मारा?
ईडी ने बेंगलुरु स्थित आरपीएफएएस टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और DeFi प्लेटफॉर्म इंस्टाडप्प (Fluid) से जुड़े परिसरों पर तलाशी ली। आरपीएफएएस पर आरोप है कि वह RBI की अनुमति के बिना USDT जैसे स्टेबलकॉइन्स के ज़रिये अंतरराष्ट्रीय धन हस्तांतरण सेवाएँ दे रही थी।
फेमा उल्लंघन की कुल राशि कितनी बताई जा रही है?
प्रारंभिक जाँच में ईडी ने फेमा, 1999 के तहत ₹4,600 करोड़ से अधिक के संभावित उल्लंघन की आशंका जताई है, जिसमें विदेशी प्लेटफॉर्म पर रखी क्रिप्टो संपत्तियाँ और अनाधिकृत सीमा-पार लेनदेन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर (करीब ₹330 करोड़) के प्रत्यक्ष उल्लंघन की पहचान की गई है।
इंस्टाडप्प (Fluid) क्या है और इस पर ईडी को क्या आपत्ति है?
इंस्टाडप्प एक ब्लॉकचेन आधारित DeFi प्लेटफॉर्म है जहाँ उपयोगकर्ता क्रिप्टो टोकन उधार दे-ले सकते हैं और विभिन्न क्रिप्टो संपत्तियों की अदला-बदली कर सकते हैं; यह अब Fluid नाम से संचालित होता है। ईडी का आरोप है कि यह प्लेटफॉर्म स्वयं को अमेरिकी कंपनी बताता था, लेकिन वास्तव में इसका संचालन और विकास भारत से किया जा रहा था, और इसके लिए BVI, सिंगापुर, दुबई में शेल कंपनियाँ बनाई गई थीं।
क्रिप्टो के ज़रिये फेमा उल्लंघन कैसे किया जाता था?
ईडी के अनुसार, उपयोगकर्ता की राशि कंपनी के बैंक खाते में जमा होती थी, फिर उससे USDT जैसे स्टेबलकॉइन खरीदे जाते थे और भारतीय एक्सचेंजों पर बेचकर लाभार्थी तक पहुँचाए जाते थे — इस पूरी प्रक्रिया में RBI-अधिकृत विदेशी प्रेषण चैनलों का उपयोग नहीं किया जाता था। 'ऑन-रैम्प' और 'ऑफ-रैम्प' सेवाओं के ज़रिये फिएट और क्रिप्टो के बीच रूपांतरण कर अधिकृत चैनलों को दरकिनार किया जाता था।
इस मामले में आगे क्या होने की संभावना है?
ईडी ने स्पष्ट किया है कि जाँच अभी जारी है और आने वाले दिनों में और खुलासे हो सकते हैं। यह मामला DeFi और क्रिप्टो-आधारित भुगतान के नियमन को लेकर भारत में एक बड़ी नीतिगत बहस को भी जन्म दे सकता है, क्योंकि मौजूदा फेमा ढाँचा 1999 का है जो इन जटिल तकनीकी संरचनाओं के लिए तैयार नहीं था।
राष्ट्र प्रेस
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