पत्रकार से 'दादी सा' तक: सुरेखा सीकरी की वह यात्रा जो एक नाटक ने बदल दी
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन की दिग्गज अभिनेत्री सुरेखा सीकरी आज भी दर्शकों के स्मृति-पटल पर उतनी ही जीवंत हैं, जितनी अपने सक्रिय दौर में थीं। 16 जुलाई 2021 को मुंबई में उनके निधन के बाद भी उनके निभाए किरदार — चाहे वह कठोर 'दादी सा' हो, संवेदनशील माँ हो या अडिग महिला का रोल — आज भी पीढ़ियों को भावनात्मक रूप से छूते हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि यह पूरी अभिनय-यात्रा एक ऐसे मोड़ से शुरू हुई जिसकी कल्पना स्वयं सुरेखा ने भी नहीं की थी।
पत्रकारिता का सपना और रंगमंच से मुलाकात
सुरेखा सीकरी का जन्म 19 अप्रैल 1945 को नई दिल्ली में हुआ था। उनका बचपन अल्मोड़ा और नैनीताल की पहाड़ी वादियों में बीता। पढ़ाई में मेधावी सुरेखा ने शुरुआत में पत्रकार बनने का सपना पाला था। लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा के दौरान उनकी जिंदगी ने अप्रत्याशित करवट ली। वहाँ उन्होंने मशहूर रंगकर्मी इब्राहिम अल्काजी का एक नाटक देखा, जिसने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। कहा जाता है कि इस नाटक ने न केवल सुरेखा को, बल्कि उनकी बहन को भी अभिनय की दुनिया की ओर आकर्षित किया।
एनएसडी से मिली अभिनय की असली तालीम
अल्काजी के नाटक से प्रेरित होकर सुरेखा ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिले के लिए आवेदन किया और उनका चयन हो गया। 1968 में वह अभिनय की विधिवत शिक्षा के लिए दिल्ली पहुँचीं और 1971 में एनएसडी से स्नातक हुईं। एनएसडी के बाद उन्होंने एनएसडी रिपर्टरी कंपनी के साथ वर्षों तक रंगमंच पर काम किया। थिएटर ने उनके अभिनय को वह गहराई और बारीकी दी, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी। 1989 में उन्हें रंगमंच में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
बॉलीवुड में कदम और राष्ट्रीय पुरस्कारों की हैट्रिक
सुरेखा सीकरी ने 1977 में फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' से बॉलीवुड में प्रवेश किया। इसके बाद उनकी फिल्मोग्राफी में गोविंद निहलानी की 'तमस' (1988), श्याम बेनेगल की 'मम्मो' (1995), 'सरफरोश', 'जुबेदा' और 'रेनकोट' जैसी समीक्षकों की प्रिय फिल्में शामिल हुईं। 'तमस' और 'मम्मो' — दोनों के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। फिर 2018 में आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म 'बधाई हो' ने उन्हें नई पीढ़ी के दर्शकों से जोड़ा। फिल्म में उन्होंने दुर्गा देवी कौशिक यानी दादी का किरदार निभाया और इसके लिए उन्हें तीसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला — एक ऐसी उपलब्धि जो हिंदी सिनेमा में विरले ही हासिल होती है। इसके अतिरिक्त उन्हें फिल्मफेयर और स्क्रीन अवॉर्ड भी प्राप्त हुए।
'दादी सा' — एक किरदार जो पहचान बन गया
सुरेखा सीकरी को घर-घर की पहचान दिलाई टेलीविजन सीरियल 'बालिका वधू' ने, जिसमें उन्होंने कल्याणी देवी उर्फ 'दादी सा' का किरदार निभाया। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली रही कि दर्शक उन्हें उनके वास्तविक नाम से कम और 'दादी सा' के नाम से अधिक पहचानने लगे। उनके संवाद-अदायगी का अनूठा अंदाज़ और चेहरे के सूक्ष्म भाव इस किरदार की आत्मा थे। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी टेलीविजन पर वरिष्ठ महिला किरदारों को प्रायः सहायक भूमिकाओं तक सीमित रखा जाता था — सुरेखा ने 'दादी सा' को केंद्रीय शक्ति में बदल दिया।
संघर्ष, साहस और अंतिम विदाई
2018 में सुरेखा सीकरी को ब्रेन स्ट्रोक हुआ, जिसने उनके स्वास्थ्य को गहरा धक्का दिया। इसके बावजूद उन्होंने अभिनय की लौ बुझने नहीं दी। उनकी अंतिम परियोजनाओं में 'घोस्ट स्टोरीज' और 'क्या मेरी सोनम गुप्ता बेवफा है?' शामिल रहीं। 16 जुलाई 2021 को मुंबई में कार्डियक अरेस्ट के कारण 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। गौरतलब है कि पाँच दशकों से अधिक के करियर में उन्होंने थिएटर, सिनेमा और टेलीविजन — तीनों माध्यमों पर समान अधिकार से राज किया, जो हिंदी मनोरंजन जगत में अत्यंत दुर्लभ है।