क्या मृत्यु के बाद गंगा नदी में अस्थि विसर्जन किया जाता है? जानिए पौराणिक मान्यता
सारांश
Key Takeaways
- गंगा नदी को मोक्षदायिनी माना जाता है।
- अस्थि विसर्जन आत्मा को शांति दिलाता है।
- यह प्रक्रिया धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है।
नई दिल्ली, 21 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। सनातन धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात, उसका अंतिम संस्कार विधिपूर्वक किया जाता है। इसे केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। इसके उपरांत अस्थियों को एक पवित्र नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है। विशेष रूप से, गंगा नदी को इस कार्य के लिए सबसे अधिक पवित्र माना गया है।
अब प्रश्न यह है कि अस्थि विसर्जन गंगा में ही क्यों किया जाता है? ऐसा क्या कारण है कि सदियों से लोग अपनी परंपरा के अनुसार गंगा में अस्थियां प्रवाहित करते आ रहे हैं?
गरुड़ पुराण के अनुसार, मानव शरीर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से मिलकर बना है और मृत्यु के पश्चात ये तत्वों में विलीन हो जाते हैं। अंतिम संस्कार के दौरान अग्नि (अग्नि तत्व) शरीर को लौटा दी जाती है। इसके बाद बची हुई अस्थियों को तीन दिनों के अंदर चुन लिया जाता है। फिर, इन्हें दस दिनों के भीतर किसी पवित्र नदी, विशेष रूप से गंगा में विसर्जित किया जाता है।
मान्यता है कि जब अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया जाता है, तो आत्मा को शांति मिलती है और वह स्वर्ग की ओर बढ़ जाती है। पुराणों में यह भी उल्लेख है कि गंगा में अस्थि विसर्जन करने से पापों का नाश होता है।
कहा जाता है कि राजा भागीरथ ने अपनी तपस्या के माध्यम से गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया था ताकि उनके पूर्वजों को मोक्ष मिल सके। इसी कारण गंगा नदी को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है।
यह भी माना जाता है कि गंगा में अस्थि विसर्जन करने से मृतक को न केवल स्वर्ग, बल्कि ब्रह्मलोक तक की प्राप्ति होती है। आत्मा को वह स्थान मिलता है, जहां पुनर्जन्म का चक्र समाप्त होता है और वह परम शांति की अवस्था को प्राप्त करती है।