17 अगस्त 2026
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वंदे मातरम विवाद: गहलोत का पलटवार — 'भाजपा की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी'

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वंदे मातरम विवाद: गहलोत का पलटवार — 'भाजपा की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी'

सारांश

चित्तौड़गढ़ में अमित शाह के वंदे मातरम वाले बयान के बाद राजस्थान की राजनीति गरमा गई। गहलोत ने पलटवार करते हुए 1896 के कलकत्ता अधिवेशन से लेकर 1950 की संविधान सभा तक का इतिहास सामने रखा — यह बहस सिर्फ एक गीत की नहीं, स्वतंत्रता संग्राम की विरासत पर दावेदारी की है।

मुख्य बातें

अमित शाह ने चित्तौड़गढ़ में आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने मल्लिकार्जुन खड़गे को स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में वंदे मातरम रोकने का इशारा किया।
अशोक गहलोत ने कहा कि इतिहासकार शाह के दावों को 'हास्यास्पद' पाएंगे; भाजपा की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी।
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गाया था।
1937 में कांग्रेस ने समावेशी कारणों से गीत के पहले दो छंदों को सार्वजनिक उपयोग के लिए अपनाया।
24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, जन गण मन राष्ट्रगान बना।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने 17 अगस्त 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के वंदे मातरम संबंधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी, यह तर्क देते हुए कि स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत के ऐतिहासिक महत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कोई भूमिका नहीं थी। चित्तौड़गढ़ में शाह की जनसभा के बाद राजस्थान में यह राजनीतिक विवाद तेज़ हो गया है।

शाह के आरोप और विवाद की शुरुआत

गृह मंत्री अमित शाह ने चित्तौड़गढ़ में रविवार को एक जनसभा को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के दिल्ली मुख्यालय में हुई एक कथित घटना का उल्लेख किया। शाह ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम गाए जाने के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को इशारा करके गीत रोकने को कहा।

शाह ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगाते हुए माँग की कि पार्टी को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से वंदे मातरम को मिटाने के 'प्रयास' के लिए माफी माँगनी चाहिए।

गहलोत का पलटवार

शाह की टिप्पणियों पर सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिये प्रतिक्रिया देते हुए अशोक गहलोत ने कहा कि इतिहासकार गृह मंत्री के दावों को 'हास्यास्पद' पाएंगे। गहलोत ने तर्क दिया कि भाषण या प्रस्तावित कानून ऐतिहासिक रिकॉर्ड को नहीं बदल सकते।

उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा अब स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चरणों से अपनी 'कथित अनुपस्थिति' को छिपाने के लिए वंदे मातरम का आह्वान कर रही है। गहलोत के अनुसार, सत्ता में आने के बाद इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश की जा रही है।

कांग्रेस और वंदे मातरम का ऐतिहासिक संबंध

गहलोत ने स्मरण दिलाया कि रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार यह गीत गाया था। इसके बाद वंदे मातरम कांग्रेस के अधिवेशनों का नियमित हिस्सा बन गया और ब्रिटिश दमन के विरुद्ध लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक शक्तिशाली नारा बना।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित और उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल यह गीत भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली प्रतीकों में से एक माना जाता है। गहलोत ने 1937 के उस निर्णय का भी उल्लेख किया जिसमें गीत के समावेशी संस्करण — पहले दो छंद — को सार्वजनिक उपयोग के लिए अपनाया गया, ताकि इसे भारत के सभी धार्मिक समुदायों में स्वीकार्य बनाया जा सके।

राष्ट्रगीत का दर्जा और संवैधानिक स्थिति

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा और उसे तुलनीय सम्मान प्राप्त होगा। गीत के बाद के छंद धार्मिक प्रतीकों के कारण ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद रहे हैं।

व्यापक राजनीतिक विभाजन

भाजपा ने अक्सर 1937 के फैसले को कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति के उदाहरण के रूप में पेश किया है, जबकि कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया समावेशी कदम बताया है। शाह और गहलोत के बीच यह ताज़ा बहस केवल एक गीत तक सीमित नहीं है — यह इस बात पर दशकों पुराने राजनीतिक विवाद को फिर से हवा देती है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का असली दावेदार कौन है। आने वाले दिनों में यह बहस और गहरी होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका समय — स्वतंत्रता दिवस के ठीक बाद — राजनीतिक रूप से सुविचारित लगता है। भाजपा जब भी चुनावी दबाव में होती है, राष्ट्रीय प्रतीकों पर विमर्श को केंद्र में लाती है; और कांग्रेस हर बार इतिहास की किताब खोलकर जवाब देती है। असली सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष इस बहस से आम नागरिक के लिए कुछ ठोस निकाल रहे हैं, या यह केवल विरासत की दावेदारी का राजनीतिक खेल है। 1937 के निर्णय पर भाजपा की आलोचना और कांग्रेस का बचाव — दोनों अपने-अपने मतदाता आधार को संबोधित करते हैं, न कि ऐतिहासिक सत्य को।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंदे मातरम विवाद में अमित शाह ने क्या आरोप लगाए?
अमित शाह ने चित्तौड़गढ़ की जनसभा में आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को वंदे मातरम रोकने का इशारा किया। उन्होंने कांग्रेस से इस 'प्रयास' के लिए माफी माँगने की माँग की।
अशोक गहलोत ने अमित शाह को क्या जवाब दिया?
गहलोत ने कहा कि इतिहासकार शाह के दावों को 'हास्यास्पद' पाएंगे और भाजपा की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि भाषण या कानून ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं बदल सकते।
वंदे मातरम का कांग्रेस से ऐतिहासिक संबंध क्या है?
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गाया था। इसके बाद यह गीत कांग्रेस के अधिवेशनों का नियमित हिस्सा बना और स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख नारा बन गया।
1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम के बारे में क्या निर्णय लिया था?
1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस ने सार्वजनिक उपयोग के लिए गीत के पहले दो छंदों को अपनाया। यह निर्णय इसलिए लिया गया ताकि गीत को भारत के सभी धार्मिक समुदायों में स्वीकार्य बनाया जा सके, क्योंकि बाद के छंद धार्मिक प्रतीकों के कारण विवादास्पद थे।
वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा कब मिला?
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा, जिसे तुलनीय सम्मान प्राप्त होगा।
राष्ट्र प्रेस
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