मध्य प्रदेश में 711 वादे लंबित: उमंग सिंघार ने मोहन यादव सरकार को बताया 'घोषणाओं की सरकार'
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 4 जुलाई को मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को 'घोषणाओं की सरकार' करार देते हुए आरोप लगाया कि 10 प्रमुख विभागों की 711 घोषणाएं अब भी अधूरी पड़ी हैं। उनके अनुसार, यह खुलासा स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय की मॉनिटरिंग रिपोर्ट से हुआ है, जो सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
मुख्य घटनाक्रम
सिंघार ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक विस्तृत बयान में कहा कि विकास के नाम पर किए गए करीब 70 प्रतिशत वादे आज तक पूरे नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा, 'हर मंच से नए वादे किए जाते हैं, लेकिन पुराने वादों का हिसाब कोई नहीं देता। घोषणाएं होती हैं, फाइलें बनती हैं और फिर वही घोषणाएं वर्षों तक कागज़ों में दबी रह जाती हैं।'
यह ऐसे समय में आया है जब मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार अपने ढाई साल पूरे कर रही है और विपक्ष जनता के बीच जवाबदेही का मुद्दा उठाने की कोशिश में है।
सबसे खराब स्थिति किस विभाग की
नेता प्रतिपक्ष के अनुसार, सर्वाधिक चिंताजनक स्थिति लोक निर्माण विभाग (PWD) की है, जहाँ 191 में से 149 घोषणाएं अब तक अधूरी हैं। इसके अलावा पंचायत, नगरीय विकास, स्कूल शिक्षा, स्वास्थ्य और जनजातीय कार्य विभागों में भी 70 प्रतिशत से अधिक घोषणाएं लंबित बताई गई हैं।
गौरतलब है कि ये वे विभाग हैं जो सीधे आम नागरिकों के जीवन से जुड़े हैं — सड़क, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और ग्रामीण विकास। इन क्षेत्रों में अधूरी घोषणाओं का असर सबसे निचले स्तर पर महसूस होता है।
विपक्ष का सरकार पर हमला
सिंघार ने तीखे शब्दों में कहा कि 'सवाल यह है कि क्या सरकार के लिए घोषणा करना ही उपलब्धि बन गया है?' उन्होंने यह भी कहा कि 'विकास की पहचान घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर पूरे हुए कामों से होती है।'
उन्होंने जनता की ओर से सरकार से माँग की कि मोहन यादव के ढाई साल के कार्यकाल का लेखा-जोखा दिया जाए — नए वादे नहीं, पुराने वादों का हिसाब।
आम जनता पर असर
आलोचकों का कहना है कि लोक निर्माण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विभागों में अधूरी योजनाओं का सीधा खामियाजा ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को भुगतना पड़ता है। जनजातीय कार्य विभाग में 70 प्रतिशत से अधिक लंबित घोषणाएं इस बात का संकेत हैं कि हाशिए पर रहने वाले वर्गों की प्राथमिकताएं कागज़ों से बाहर नहीं निकल पाईं।
क्या होगा आगे
विपक्ष के इस हमले के बाद राज्य सरकार पर दबाव बढ़ने की संभावना है कि वह लंबित घोषणाओं की स्थिति पर सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दे। मॉनिटरिंग रिपोर्ट के आधार पर उठाए गए इन सवालों का जवाब मोहन यादव सरकार को विधानसभा या अन्य मंचों पर देना होगा।