20 सितंबर 2026
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जीआई टैग के बाद चंपारण के मर्चा चूड़ा की मांग देश-विदेश में बढ़ी, ₹150 प्रति किलो बिक रहा

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जीआई टैग के बाद चंपारण के मर्चा चूड़ा की मांग देश-विदेश में बढ़ी, ₹150 प्रति किलो बिक रहा

सारांश

चंपारण का मर्चा चूड़ा अब सिर्फ स्थानीय पहचान नहीं रहा — जीआई टैग ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नई ऊँचाई दी है। ₹150 प्रति किलो की कीमत, छह से अधिक राज्यों में माँग और 100 लोगों को रोज़गार — यह बिहार की कृषि विरासत का एक चमकता उदाहरण है।

मुख्य बातें

चंपारण के मर्चा चूड़ा को जीआई टैग मिलने के बाद देश-विदेश में माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
मर्चा चूड़ा वर्तमान में ₹150 प्रति किलोग्राम की दर पर बिक रहा है।
हर महीने 50 से 60 क्विंटल मर्चा चूड़ा तैयार होता है और इससे करीब 100 लोगों को रोज़गार मिल रहा है।
कारोबारी रामजी प्रसाद के परिवार में यह व्यवसाय 1969 से चल रहा है; 1997 में मशीनीकरण हुआ।
उत्पाद बिहार सहित उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड और झारखंड में भेजा जाता है।
मर्चा धान की खेती रासायनिक खाद-मुक्त , पारंपरिक जैविक पद्धति से की जाती है।

चंपारण के विख्यात मर्चा चूड़ा को जीआई टैग (भौगोलिक संकेत) मिलने के बाद इसकी माँग देश के कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई है। चूड़ा कारोबारी रामजी प्रसाद के अनुसार, इस उत्पाद की सबसे बड़ी पहचान इसकी वह अनूठी सुगंध है जो कुटाई से लेकर पैकेजिंग और घर में रखने तक बनी रहती है। 20 सितंबर 2026 को उन्होंने बताया कि जीआई टैग ने इस पारंपरिक उत्पाद को एक नई राष्ट्रीय पहचान दिलाई है।

मर्चा चूड़ा की विशिष्टता

चंपारण की मिट्टी में उगने वाले मर्चा धान का दाना काली मिर्च जैसा दिखाई देता है, इसीलिए इसे 'मर्चा' कहा जाता है। रामजी प्रसाद के अनुसार, चंपारण के बाहर दूसरे क्षेत्रों में मर्चा धान की खेती करने पर उसमें वही विशिष्ट खुशबू नहीं आती, जो इस क्षेत्र की मिट्टी की देन है।

मर्चा धान की कुटाई के दौरान मिल में जो सुगंध फैलती है, वह पैकेजिंग के बाद भी बनी रहती है। जिस घर में इसे रखा जाता है, वहाँ भी इसकी खुशबू महसूस होती है — यह विशेषता इसे अन्य किस्मों के चूड़े से पूरी तरह अलग करती है।

खेती का मौसम और जैविक पद्धति

मर्चा धान की बुआई सावन के महीने में शुरू होती है और नवंबर के अंत तक फसल तैयार हो जाती है। इसकी खेती पूरी तरह पारंपरिक और जैविक (ऑर्गेनिक) तरीके से होती है — किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता। रामजी प्रसाद ने बताया कि चंपारण के कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में ही किसान इसकी खेती करते हैं और इससे उन्हें आर्थिक लाभ मिल रहा है।

उन्होंने किसानों से अधिक-से-अधिक मर्चा धान उगाने की अपील करते हुए कहा कि बढ़ती माँग का लाभ खेती करने वाले और कारोबार करने वाले दोनों को मिल सकता है।

बाज़ार भाव और कारोबार का विस्तार

वर्तमान में मर्चा चूड़ा बाज़ार में ₹150 प्रति किलोग्राम की दर पर बिक रहा है। रामजी प्रसाद के परिवार में यह कारोबार 1969 से चला आ रहा है। शुरुआत में मर्चा धान की कुटाई पूरी तरह हाथ से होती थी, जिसमें अत्यधिक समय और श्रम लगता था।

1997 में मशीन लगाने के बाद उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अब हर महीने करीब 50 से 60 क्विंटल मर्चा चूड़ा तैयार किया जाता है और इस उद्योग से करीब 100 लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार मिला हुआ है।

राज्यों और विदेश तक पहुँच

मर्चा चूड़ा अब बिहार की सीमाएँ पार कर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड और झारखंड सहित कई राज्यों में भेजा जाता है। विदेश जाने वाले लोग इसे उपहार के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान भी धीरे-धीरे बन रही है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत के कई पारंपरिक कृषि उत्पाद जीआई टैग के ज़रिए वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बना रहे हैं। गौरतलब है कि जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति को कानूनी संरक्षण देता है, जिससे नकली उत्पादों की बिक्री पर रोक लगती है और असली उत्पादकों को उचित मूल्य मिलता है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद यदि किसान संगठित होकर उत्पादन बढ़ाएँ और ब्रांडिंग पर ध्यान दें, तो मर्चा चूड़ा बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बढ़ती माँग के मद्देनज़र मर्चा चूड़ा का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है, बशर्ते इसकी जैविक और पारंपरिक पहचान बरकरार रखी जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक आर्थिक उत्प्रेरक भी हो सकता है — बशर्ते उसके बाद ब्रांडिंग, आपूर्ति श्रृंखला और किसान-जुड़ाव पर ठोस काम हो। ₹150 प्रति किलो की मौजूदा कीमत उत्साहजनक है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या बढ़ती माँग का लाभ खेत तक पहुँचता है या बिचौलियों तक सिमट जाता है। बिहार के कई जीआई उत्पादों का अनुभव बताता है कि टैग मिलने के बाद संगठित विपणन और सरकारी सहयोग के बिना माँग का उछाल अस्थायी साबित होता है। मर्चा चूड़ा की जैविक और भौगोलिक विशिष्टता उसकी सबसे बड़ी ताकत है — इसे बाज़ार में 'प्रीमियम' दर्जे तक ले जाने के लिए सहकारी ढाँचे और निर्यात नीति दोनों की ज़रूरत है।
RashtraPress
20 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चंपारण का मर्चा चूड़ा क्या है और यह क्यों खास है?
मर्चा चूड़ा बिहार के चंपारण क्षेत्र में उगाए जाने वाले मर्चा धान से बना पारंपरिक चपटा चावल (चूड़ा) है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी अनूठी सुगंध है जो केवल चंपारण की मिट्टी में उगे धान में आती है और अन्य क्षेत्रों में खेती करने पर नहीं आती।
मर्चा चूड़ा को जीआई टैग कब और क्यों मिला?
मर्चा चूड़ा को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग इसकी भौगोलिक विशिष्टता और पारंपरिक उत्पादन पद्धति के आधार पर दिया गया। यह टैग इस बात को कानूनी मान्यता देता है कि असली मर्चा चूड़ा केवल चंपारण क्षेत्र में ही तैयार हो सकता है।
मर्चा चूड़ा की मौजूदा कीमत क्या है?
कारोबारी रामजी प्रसाद के अनुसार, वर्तमान में मर्चा चूड़ा बाज़ार में करीब ₹150 प्रति किलोग्राम की दर पर बिक रहा है। जीआई टैग मिलने के बाद माँग बढ़ने से इसके मूल्य में और वृद्धि की संभावना है।
मर्चा चूड़ा कहाँ-कहाँ भेजा जाता है?
मर्चा चूड़ा बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड और झारखंड में भेजा जाता है। विदेश जाने वाले लोग भी इसे उपहार के रूप में अपने साथ ले जाते हैं।
मर्चा धान की खेती कब होती है और इसमें किसानों को क्या फायदा है?
मर्चा धान की बुआई सावन के महीने में शुरू होती है और नवंबर के अंत तक फसल तैयार हो जाती है। जैविक और पारंपरिक तरीके से की जाने वाली इस खेती से चंपारण के किसानों को आर्थिक लाभ मिल रहा है और जीआई टैग के बाद माँग बढ़ने से यह लाभ और बढ़ने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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