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गुजरात पुलिस ने ₹1,071 करोड़ के साइबर फ्रॉड नेटवर्क का भंडाफोड़, असम से मुख्य हैंडलर गिरफ्तार

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गुजरात पुलिस ने ₹1,071 करोड़ के साइबर फ्रॉड नेटवर्क का भंडाफोड़, असम से मुख्य हैंडलर गिरफ्तार

सारांश

गुजरात पुलिस ने एक ऐसे शख्स को पकड़ा जो 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम की रकम को 1,754 बैंक खातों और 23 क्रिप्टो वॉलेट के जरिए चीनी आपराधिक नेटवर्क तक पहुँचाता था — 1,090 मामलों में ₹1,071 करोड़ से अधिक का जाल।

मुख्य बातें

गुजरात साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने असम के बारपेटा से रफीकुल आलम (25) को गिरफ्तार किया।
आरोपी पर 1,090 साइबर अपराध मामलों में ₹1,071 करोड़ से अधिक के लेन-देन का आरोप है।
एक घंटे में 1,754 बैंक खातों के जरिए लेन-देन; 23 क्रिप्टो वॉलेट से ₹16 करोड़ का खुलासा।
आरोपी व्हाट्सएप और टेलीग्राम से चीनी नेटवर्क को रकम और ऑपरेशनल जानकारी भेजता था।
जांच में 10 अन्य पीड़ितों की पहचान हुई जिन्हें समय रहते बचाया गया।

गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने 18 अगस्त 2026 को असम के बारपेटा जिले के रहने वाले 25 वर्षीय रफीकुल आलम को गिरफ्तार किया। आलम पर एक अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क के लिए मुख्य वित्तीय संचालक (फाइनेंशियल हैंडलर) के रूप में काम करने का आरोप है, जो कथित तौर पर 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम को अंजाम देता था। जांच में पूरे भारत में 1,090 साइबर अपराध मामलों से जुड़े ₹1,071 करोड़ से अधिक (सटीक राशि: ₹10,71,55,66,034) के लेन-देन का पता चला है।

गिरफ्तारी कैसे हुई

गुजरात पुलिस की टीम ने तीन दिन तक भेष बदलकर बारपेटा में आलम के घर की निगरानी (रेकी) की और तकनीकी विश्लेषण के बाद उसके ठिकाने पर छापा मारा। जांच तब शुरू हुई जब साइबर सेंटर ने एक वरिष्ठ नागरिक की पहचान की, जिसे कथित तौर पर 'लाइव डिजिटल अरेस्ट' का शिकार बनाया जा रहा था।

पूछताछ में पीड़ित ने बताया कि धोखेबाजों ने महाराष्ट्र पुलिस और सर्वोच्च न्यायालय के नकली पत्रों का इस्तेमाल करके उन्हें डिजिटल रूप से हिरासत में लेने का नाटक किया। पुलिस ने आलम के पास से तकनीकी उपकरण भी जब्त किए।

नेटवर्क का विस्तार और मोडस ऑपरेंडी

पीड़ित के बैंक खातों की तकनीकी जांच से जांचकर्ताओं को लगभग 10 अन्य लोगों की पहचान करने में मदद मिली, जिन्हें कथित तौर पर उसी समय भारत के अलग-अलग हिस्सों में डिजिटल अरेस्ट किया जा रहा था। पुलिस टीमें उनके घरों पर पहुँचीं और धोखेबाजों को पैसे भेजे जाने से रोका।

जांच के अनुसार, आलम कथित तौर पर 'डिजिटल अरेस्ट' और अन्य साइबर धोखाधड़ी से प्राप्त रकम को कई बैंक खातों के जरिए घुमाकर क्रिप्टोकरेंसी में बदलता था और फिर उसे एक चीनी आपराधिक नेटवर्क के सदस्यों को भेजता था। वित्तीय निगरानी एजेंसियों की नजर से बचने के लिए वह बड़ी रकम को छोटी-छोटी किश्तों में ट्रांसफर करने की तकनीक (स्प्लिट ट्रांसफर) का इस्तेमाल करता था।

एक मामले में एक घंटे के भीतर भारत में 1,754 बैंक खातों के जरिए लेन-देन किए गए। आरोपी व्हाट्सएप और टेलीग्राम के माध्यम से चीनी अपराधियों के साथ स्कैनर, यूजर आईडी, पासवर्ड, क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट की जानकारी और अन्य ऑपरेशनल निर्देशों का आदान-प्रदान करता था।

क्रिप्टो और म्यूल नेटवर्क का जाल

आलम के मोबाइल फोन से 23 क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बरामद किए गए, जिनके जरिए ₹16 करोड़ के लेन-देन का पता चला। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने क्रिप्टोकरेंसी की अवैध खरीद-बिक्री के लिए 'चिप सेलर' ऐप का और पैसों के लेन-देन के लिए गेमिंग खातों का सहारा लिया। वह कथित तौर पर 'म्यूल अकाउंट नेटवर्क' संचालित करने में भी संलिप्त था।

आम जनता पर असर और आगे की जांच

इस जांच से साइबर सेंटर को 'डिजिटल अरेस्ट' के कई मामलों में समय रहते हस्तक्षेप करने में मदद मिली और संभावित पीड़ितों को आर्थिक नुकसान से बचाया गया। गौरतलब है कि 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम हाल के वर्षों में देशभर में तेजी से फैला है, जिसमें ठग खुद को सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को घर में 'डिजिटल हिरासत' में रखने का भ्रम पैदा करते हैं।

जांच अभी जारी है और अधिकारियों के अनुसार इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संदिग्धों की भी तलाश की जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

071 करोड़ और 1,090 मामलों का यह आँकड़ा केवल एक गिरफ्तारी की कहानी नहीं है — यह उस व्यापक तंत्र की झलक है जिसमें भारतीय म्यूल खाते, क्रिप्टो रेल और चीनी ऑपरेटर मिलकर काम करते हैं। चिंताजनक यह है कि एक घंटे में 1,754 खातों का इस्तेमाल बताता है कि वित्तीय निगरानी की मौजूदा परतें इस गति से मेल नहीं खा पा रहीं। 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम का शिकार अक्सर वरिष्ठ नागरिक होते हैं — और नकली सरकारी दस्तावेजों का इस्तेमाल संस्थागत भरोसे को हथियार बनाने की खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है। असली सवाल यह है कि क्या बैंकिंग और क्रिप्टो नियामक इस तरह के स्प्लिट-ट्रांसफर पैटर्न को वास्तविक समय में पकड़ने के लिए तैयार हैं।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम क्या होता है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर धोखाधड़ी है जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI या अदालत का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को 'हिरासत में' होने का भ्रम देते हैं और डर दिखाकर पैसे ऐंठते हैं। इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस और सर्वोच्च न्यायालय के नकली पत्रों का भी इस्तेमाल किया गया।
रफीकुल आलम को कैसे पकड़ा गया?
गुजरात पुलिस ने एक वरिष्ठ नागरिक के मामले की जांच के दौरान तकनीकी विश्लेषण से आलम की पहचान की। इसके बाद टीम ने तीन दिन तक बारपेटा में भेष बदलकर निगरानी की और फिर उसके घर पर छापा मारकर गिरफ्तार किया।
इस नेटवर्क में पैसे कैसे ट्रांसफर किए जाते थे?
आरोपी फ्रॉड की रकम को कई बैंक खातों में स्प्लिट ट्रांसफर के जरिए भेजता था, फिर उसे क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर चीनी नेटवर्क को भेजता था। एक घंटे में 1,754 बैंक खातों का इस्तेमाल और 'चिप सेलर' ऐप व गेमिंग खातों का सहारा लेना इसी तरीके का हिस्सा था।
इस जांच से कितने पीड़ितों को बचाया गया?
जांच के दौरान साइबर सेंटर ने लगभग 10 ऐसे लोगों की पहचान की जो उसी समय 'डिजिटल अरेस्ट' के शिकार हो रहे थे। पुलिस टीमें उनके घरों पर पहुँचीं और उन्हें पैसे भेजने से रोका।
इस मामले में कुल कितनी राशि का खुलासा हुआ है?
जांच में 1,090 साइबर अपराध मामलों से जुड़े ₹10,71,55,66,034 (लगभग ₹1,071 करोड़) के लेन-देन का पता चला है। इसके अलावा आरोपी के 23 क्रिप्टो वॉलेट से ₹16 करोड़ के अलग लेन-देन भी सामने आए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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