गुरु पूर्णिमा पर वाराणसी के पातालपुरी मठ में अनूठी मिसाल, 100 से अधिक मुस्लिम श्रद्धालुओं ने ली गुरु दीक्षा
सारांश
मुख्य बातें
वाराणसी के पातालपुरी मठ में 29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गंगा-जमुनी तहजीब की एक अनूठी तस्वीर सामने आई, जब 100 से अधिक मुस्लिम श्रद्धालुओं ने जगतगुरु बालक दास महाराज से गुरु दीक्षा ग्रहण की और विधिवत गुरु पूजा में भाग लिया। श्रद्धालुओं ने एकस्वर में कहा कि गुरु जाति और मज़हब की सीमाओं से परे ज्ञान एवं मार्गदर्शन के प्रतीक होते हैं।
मठ की परंपरा और पृष्ठभूमि
जगतगुरु बालक देवाचार्य ने बताया कि यह पीठ जगतगुरु रामानंद जी महाराज की परंपरा की है, जिसकी स्थापना जगतगुरु नरहर्यानंद जी महाराज ने की थी। उन्होंने कहा, 'यह आचार्य श्री की ऐसी पीठ है, जिसने सभी को अपनाया है। यहां हर धर्म और वर्ग के लोग आते हैं और श्रद्धा भाव से गुरु की पूजा करते हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गुरु पूर्णिमा वह अवसर है जब वर्षभर किसी कारणवश गुरु पूजन से वंचित रहे शिष्य आकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश
देवाचार्य जी ने कहा, 'अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरु होते हैं। मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग भी गुरु मंत्र लेते हैं, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और आरती में शामिल होते हैं। यह कोई नई परंपरा नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही समरसता की भावना है।' उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अहंकार और द्वेष से दूर रहें और भगवान राम के दिखाए मार्ग पर चलें।
श्रद्धालुओं की आवाज़
गुरु पूजा के लिए आए अफरोज अहमद ने कहा, 'हम हर साल जगतगुरु महाराज के यहां आते हैं और उनकी आरती व पूजन करते हैं। बिना गुरु के किसी भी व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।' उन्होंने बताया कि उनके गुरु डॉ. राजीव श्रीगुरुजी हैं, जो विशाल भारत संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। अफरोज ने कट्टरपंथी सोच रखने वालों को संबोधित करते हुए कहा कि जाति, धर्म और मज़हब से ऊपर उठकर गुरु का सम्मान करना ज़रूरी है और इस अवसर पर उनका उद्देश्य समाज में फैली नफरत को खत्म कर आपसी भाईचारे को बढ़ावा देना है।
एक अन्य श्रद्धालु जाकिर हुसैन ने बताया कि वे पिछले दो-तीन वर्षों से बालक दास जी महाराज से जुड़े हैं। उन्होंने कहा, 'हिंदू-मुस्लिम की बात करें तो हमारी जड़ें इसी भारत से जुड़ी हैं। पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन हमारी मिट्टी, हमारी संस्कृति और हमारी विरासत एक है।' जाकिर ने यह भी कहा कि जब लोग विदेश जाकर वहाँ की संस्कृति अपनाते हैं, तो अपने देश की संस्कृति को अपनाने में संकोच क्यों।
आम जनता और समाज पर असर
यह आयोजन ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब देशभर में सांप्रदायिक तनाव की खबरें बीच-बीच में सामने आती रहती हैं। वाराणसी जैसे धर्मनगरी में हिंदू मठ में मुस्लिम श्रद्धालुओं की सक्रिय भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि जमीनी स्तर पर सौहार्द की जड़ें अभी भी गहरी हैं। गौरतलब है कि पातालपुरी मठ की यह परंपरा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रही — यहाँ विभिन्न धर्मों के अनुयायी दशकों से आते रहे हैं।
आगे की राह
देवाचार्य जी और श्रद्धालुओं का यह सामूहिक संदेश स्पष्ट है — गुरु-शिष्य परंपरा धर्म की दीवारें नहीं पहचानती। आने वाले समय में इस मठ की समावेशी परंपरा अन्य सामाजिक पहलों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बन सकती है।