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हमीरपुर के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट, 10 साल में 28,800 कार्बन क्रेडिट का लक्ष्य

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हमीरपुर के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट, 10 साल में 28,800 कार्बन क्रेडिट का लक्ष्य

सारांश

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट महज एक पर्यावरणीय कदम नहीं — यह कार्बन बाज़ार में राज्य की दावेदारी है। 10 साल में 28,800 कार्बन क्रेडिट और 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि पर असर — सुक्खू सरकार का यह प्रयोग राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।

मुख्य बातें

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट स्थापित किया जा रहा है।
वाईएस परमार यूनिवर्सिटी (नौनी) , वन विभाग और प्रोक्लाइम के बीच पिछले वर्ष अगस्त में त्रिपक्षीय समझौता हुआ था।
बायोमास ₹2.50 प्रति किलोग्राम की दर पर खरीदा जा रहा है; गुणवत्ता के लिए परफॉर्मेंस-बेस्ड इंसेंटिव भी दिए जा रहे हैं।
10 वर्षों में लगभग 28,800 कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होने की संभावना।
'हिम एवरग्रीन' कार्यक्रम 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को कवर करेगा और 13.5 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन का प्रबंधन करेगा।
यूएनईपी के पूर्व निदेशक एरिक सोल्हेम ने हिमाचल सरकार के प्रयासों की सराहना की।

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट स्थापित किया जा रहा है, जो वन संसाधनों के सस्टेनेबल मैनेजमेंट को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के नए रास्ते खोलेगा। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्लांट की प्रगति की समीक्षा करते हुए 30 जून 2026 को कहा कि यह परियोजना राज्य को कार्बन क्रेडिट अर्जित करने में मदद करेगी और पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास दोनों में ऐतिहासिक योगदान देगी।

परियोजना की पृष्ठभूमि और समझौता

पिछले वर्ष अगस्त में डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री (नौनी), वन विभाग और प्रोक्लाइम के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत हमीरपुर जिले के नेरी और जाहू — दो स्थानों पर बायोचार प्लांट स्थापित किए जाने हैं। यह साझेदारी शैक्षणिक संस्थान, सरकारी विभाग और निजी क्षेत्र को एक साझे पर्यावरणीय लक्ष्य के लिए एकजुट करती है।

बायोमास संग्रह और प्रोत्साहन व्यवस्था

इस परियोजना के अंतर्गत चीड़ की पत्तियों, लैंटाना, बांस और अन्य वनस्पतियों से प्राप्त बायोमास का उपयोग बायोचार निर्माण में किया जाएगा। एकत्रित बायोमास को ₹2.50 प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा जा रहा है। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए परफॉर्मेंस-बेस्ड इंसेंटिव की व्यवस्था भी की गई है, जिससे स्थानीय संग्रहकर्ताओं को बेहतर काम के लिए अतिरिक्त लाभ मिल सके।

कार्बन क्रेडिट और जलवायु लाभ

एक आधिकारिक बयान के अनुसार, 10 वर्षों की परिचालन अवधि में इस परियोजना से लगभग 28,800 कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होने की संभावना है। यह हिमाचल प्रदेश की ग्रीन पहलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने में सहायक होगा। परियोजना में जीआईएस, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल डेटा कलेक्शन प्रणालियाँ अंतरराष्ट्रीय कार्बन मार्केट मानकों के अनुरूप लागू की जाएंगी।

हिम एवरग्रीन कार्यक्रम और व्यापक प्रभाव

'हिम एवरग्रीन इंटीग्रेटेड क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर एंड एग्रो-फॉरेस्ट्री प्रोग्राम' के तहत खेती के तंत्र में वृक्षारोपण को शामिल किया जाएगा। यह कार्यक्रम हिमाचल प्रदेश की 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को आच्छादित करेगा और 13.5 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के प्रबंधन में सक्षम होगा। इससे मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन में मापनीय सुधार अपेक्षित है।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन और आगे की राह

यूएनईपी के पूर्व कार्यकारी निदेशक एरिक सोल्हेम ने कहा कि संगठन जलवायु संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिक सटीकता और जमीनी स्तर पर व्यावहारिक क्रियान्वयन को एकसाथ लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कार्बन उत्सर्जन में कटौती के प्रयासों में हिमाचल प्रदेश सरकार की पहल की सराहना की। यह परियोजना ऐसे समय में आई है जब देश भर में राज्य सरकारें जलवायु वित्तपोषण के नए मॉडल तलाश रही हैं — और हिमाचल का यह प्रयोग एक संभावित राष्ट्रीय टेम्पलेट बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उन्हें कार्बन क्रेडिट में बदलना एक चतुर दोहरा समाधान है। लेकिन असली परीक्षा यह है कि ₹2.50 प्रति किलोग्राम की दर स्थानीय संग्रहकर्ताओं के लिए पर्याप्त और टिकाऊ है या नहीं — क्योंकि भारत में कई बायोमास योजनाएँ आपूर्ति श्रृंखला की कमज़ोरी से दम तोड़ चुकी हैं। 28,800 कार्बन क्रेडिट का अनुमान अंतरराष्ट्रीय सत्यापन पर निर्भर करेगा, और वह प्रक्रिया अक्सर उतनी सरल नहीं होती जितनी घोषणाओं में दिखती है। यदि यह मॉडल वास्तव में काम करता है, तो यह उत्तराखंड और अरुणाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए एक दोहराने योग्य ढाँचा बन सकता है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हमीरपुर का बायोचार प्लांट क्या है और यह कहाँ बन रहा है?
यह देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट है, जो हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के नेरी और जाहू में स्थापित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य चीड़ की पत्तियों, लैंटाना और बांस जैसे वन बायोमास को बायोचार में परिवर्तित करना है।
इस परियोजना में कौन-कौन से संगठन शामिल हैं?
पिछले वर्ष अगस्त में डॉ. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री (नौनी), हिमाचल प्रदेश वन विभाग और प्रोक्लाइम के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। यह सरकारी, शैक्षणिक और निजी क्षेत्र की साझेदारी है।
बायोचार प्लांट से कितने कार्बन क्रेडिट मिलेंगे?
आधिकारिक बयान के अनुसार, 10 वर्षों की परिचालन अवधि में इस परियोजना से लगभग 28,800 कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होने की संभावना है। ये कार्बन क्रेडिट अंतरराष्ट्रीय कार्बन मार्केट मानकों के अनुरूप सत्यापित किए जाएंगे।
स्थानीय लोगों को इस परियोजना से क्या फायदा होगा?
बायोमास संग्रहकर्ताओं को ₹2.50 प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान किया जाएगा और गुणवत्ता बनाए रखने पर परफॉर्मेंस-बेस्ड इंसेंटिव भी मिलेगा। इससे वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा होंगे।
हिम एवरग्रीन कार्यक्रम क्या है और इसका दायरा कितना बड़ा है?
'हिम एवरग्रीन इंटीग्रेटेड क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर एंड एग्रो-फॉरेस्ट्री प्रोग्राम' हिमाचल प्रदेश की 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को कवर करेगा। यह कार्यक्रम 13.5 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन का प्रबंधन करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और जैव विविधता बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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